मैं चुप था,
तब तक अच्छा था।
जब बोल पड़ा,
तो बुरा हुआ।
पर मेरा इसमें दोष नहीं,
तुमने ज़िद की,
मुझसे बोले,
जो बात है दिल में,
साफ़ कहो।
मैं कह दी,
तुम सह न सके।
मुँह फुला के मुझसे रूठ गए।
अब मैं बोला,
क्यूँ रूठे हो?
तो बोले,
बड़े बुरे हो तुम।
इससे पहले ही अच्छे थे,
इतना कहकर तुम चले गए,
मैं खड़ा-खड़ा सोचता रहा,
जब चुप था तब ही बेहतर था।
-अंशुल तिवारी।