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Saturday, 18 February 2017

एक बेटी की बिदाई के सन्दर्भ में....

एक बेटी की बिदाई के सन्दर्भ में....

खिलौने छीनकर अपने यूँ दौड़ती है अभी,
वो है बयार-सी जैसे, कहाँ हुई है बड़ी?

आँगन को सजाती है रंगोली बनकर,
गूँजती घर में वो सारे ठिठोली बनकर।

दीयों में रहती है घर के वो रौशनी बनकर,
छिटकती है वो झरोखों से चाँदनी बनकर।

घर सर पे उठाती है वो तूफ़ान की तरह,
छाई रहती है ज़ेहन पे वो आसमाँ की तरह।

आँखों में वो बसती है यूँ अरमाँ बनकर,
दिलों में रहती हमारे वो जैसे जाँ बनकर।

जहाँ में आई वो जैसे मेरी पहचान बनकर,
कहाँ वो चल पड़ी है आज यूँ  मेहमाँ बनकर।

जो है दुआओं भरा दिल, वो लिए जा रही है,
नया जहान, नई ज़िन्दगी बुला रही है।

ख़ुशी के फूल उसकी राह में खिलते ही रहें,
कारवाँ जश्न के हर मोड़ पे मिलते ही रहें।

- अंशुल।