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Monday, 25 September 2017

तजुर्बा...

सारे क़िस्से की तर्जुमानी है,
बात थी राज़, अब ज़बानी है।

मिल भी जाए तो साथ क्या देगी?
यहाँ हर शै है क्या, बेमानी है।

जिसको दिल से लगाए बैठे हो,
ये क़ुर्बत-ए-जहाँ भी फ़ानी है।

हस्ती क्या है तुम्हारी और मेरी,
जैसे कोई मौज आनी-जानी है।

करवटें हर कदम पे लेती है,
ज़िन्दगी, पेचीदा कहानी है।

प्यार, सच्चाई, वफ़ादारी की,
बात अब हो चुकी पुरानी है।

-अंशुल तिवारी।