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Saturday, 14 October 2017

वटवृक्ष

वटवृक्ष...
राह में चलते हुए , कुछ देखकर मैं रुक गया,
भीड़ की दीवार थी इक, वृक्ष को घेरे हुए।

है सुशोभन वृक्ष कितना , थे यही सब कह रहे,
वाह!! क्या सर्वांग सुंदर है ये वृक्ष विशाल-सा।

देखकर सौंदर्य उसका, जन सभी मोहित हुए,
देखने वालों के मन को था, वो सुख से भर रहा।

थे रखे किसने यहाँ पर, बीज इस द्रुम के कभी??
था ये एक संयोग या फिर, फल किसी संकल्प का??

योजना जो भी हो विधि की, वृक्ष था अद्भुत मगर,
था घना, शालीन अतिशय, नींव से अतिशय सुदृढ़।

पर विलक्षण और भी इक गुण जो था उस वृक्ष में,
कर दिया जिसने अचंभित सबको था, प्रत्यक्ष में।

बढ़ रहा था वो निरंतर पा के दृष्टि पात को,
जान पाया न कोई जन इस विलक्षण बात को।

जो भी उसको देखता, बढ़ता हुआ ही पा रहा था,
ध्यान सबका प्राप्त कर ,वह और बढ़ता जा रहा था।

वृक्ष की शोभा में डूबे लोग वर्णन कर रहे थे,
छाँह में बैठे हुए, कुछ देख सुख से भर रहे थे।

कुछ घड़ी बीती, समय ज्यों कुछ क़दम आगे चला,
तब अचानक कुछ घटा जो, रच गया विस्मय नया??

दृश्य था जो परम् सुंदर, क्रूर था अब हो गया,
मोद और आनंद अब प्रत्येक जन का खो गया।

अब उपस्थित था वहाँ वह, दृश्य अति विकराल था,
तमोरंजित हर दिशा, सामने आया काल था।

लीलने को सूर्य को, वह वृक्ष बढ़ता ही गया,
हर जगह से रोशनी को तीव्रता से पी गया।

लग रहा था लीलने नभ को बढ़ा अहिराज हो,
जैसे सृष्टि का विलय होने ही वाला आज हो।

थे सशंकित लोग सब, यह क्या हुआ?? यह क्या हुआ??
क्रूरता अब देखिए करती है क्या, करतब नया??

हर दिशा, दिग अंत में, फैला हुआ वटवृक्ष था,
खेद, चिंता, दुःख का, सागर वहाँ प्रत्यक्ष था।

स्वर सभी आनंद के चीत्कार से थे बन गए,
देखकर भयभीत जन को, वृक्ष पल्लव तन गए।

सर उठाए व्योम तक, वटवृक्ष फैला नाग-सा,
था गरल करता वमन, जो जल रहा था आग-सा।

सत्य को करता पराजित, जड़ जमाए था खड़ा,
मैं ही हूँ सर्वस्व स्वामी, इस कथन पर था अड़ा।

ये नहीं था वृक्ष कोई, ये "अहं" मेरा ही था,
घेर कर मुझको खड़ा, "अभिमान" ये मेरा ही था।

अब न था कोई वहाँ पर "पर", वहाँ "मैं" ही तो था,
रौंदकर मुझको चरण से, मैं ही था मुझपर खड़ा।

अब न था कोई साथ मेरे, बस गहन तम था खड़ा,
हाय!! ये अभिमान मेरा, हो गया कितना बड़ा??

अब न तो आनंद था, ना कोई साथी संग था,
अब निहित मेरे लिए, बस एक काला रंग था।

मैंने पा कर तुच्छ लब्धि, बोध अपना खो गया,
और पत्थर के लिए, आनंद हीरा खो दिया।

- अंशुल।
14.10.2017
पुणे।

Friday, 13 October 2017

कविता का जन्म...

कविता,,,

चट्टानों का हृदय चीरकर,
ज्यों उग आता है नव अंकुर,
उस अंकुर की हरी दूब-सी,
मन में स्वयं उभरती कविता।

भोर भए ललकार तिमिर को,
सूरज की मद्धम किरणों-सी।
जैसे जगत प्रकाशित करती,
नभ से स्वयं उतरती कविता।

साँझ ढले आकाश में ऊँचे,
एक छोर से परम क्षितिज तक।
साथ परिंदों का लेकर के,
खुले गगन में उड़ती कविता।

और कभी बूंदों में ढलकर,
मेघों की गोदी से गिरकर।
बूँद-बूँद से सागर बनकर,
कागज़ तले मचलती कविता।

सच है, वो मिलने आती है,
दबे पैर और चोरी- चोरी।
अपनी ही मर्ज़ी की मालिक,
खुद मनमानी करती कविता।

- अंशुल।