जब कभी,
जब कभी मैं,
तुम्हें देखता हूँ।
तो पाता हूँ, तुमको,
किसी सुहाने ख़्वाब से उपजी,
मीठी मुस्कुराहट जैसा।
बेबाक छिटकती चाँदनी के,
रेशमी धागों सा महीन।
या,
अल-सुबह गुलाब की पंखुड़ियों से,
लिपटी शबनम-सा पाकीज़ा।
जब कभी मैं,
तुम्हें देखता हूँ।
तो लगता है,
तमन्नाएँ ओढ़कर इंसानी लिबास,
मुक़म्मल हो उठी हैं।
-अंशुल तिवारी।