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Tuesday, 12 December 2017

जब कभी तुम्हें!!!

जब कभी,

जब कभी मैं,
तुम्हें देखता हूँ।
तो पाता हूँ, तुमको,

किसी सुहाने ख़्वाब से उपजी,
मीठी मुस्कुराहट जैसा।

बेबाक छिटकती चाँदनी के,
रेशमी धागों सा महीन।

या,
अल-सुबह गुलाब की पंखुड़ियों से,
लिपटी शबनम-सा पाकीज़ा।

जब कभी मैं,
तुम्हें देखता हूँ।
तो लगता है,
तमन्नाएँ ओढ़कर इंसानी लिबास,
मुक़म्मल हो उठी हैं।

-अंशुल तिवारी।