सन्दर्भ:
कभी कभी सत्य को भुला देने में ही व्यवहारिकता होती है।
पर क्या ये उचित है?? ये कहाँ तक उचित है??
क्या इसी तर्ज पर सत्य को भूल अन्याय सहना उचित है?
इसी प्रश्न को उठाती हुई ये कविता...
क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,
रगों में खौलते- उबलते सत्य को,
रोक लेना, आँखों में ही।
पीस कर रख देना,
दांतों के बीच।
या, फिर छुपा लेना,
किसी पुराने ज़ख़्म की तरह।
चेहरे की निर्जीव, मृत मुस्कराहट के पीछे।
क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,
ह्रदय में उभरते, कौंधते सत्य को
दफ़न कर देना धड़कनों के शोर में।
घोंट देना गला उसका, अपनी ही मुट्ठियों से?
या, रख देना पैरों तले कुचलकर।
क्यूँ ज़रूरी होता है?
अक्सर,
सत्य को अंगारे सा हाँथों में दबाए रखना,
या, सहन करना त्वचा में धँसी फाँस की तरह क्षण-क्षण।
क्यूँ ज़रूरी होता है?
सामने खड़े, सत्य से नज़रें चुराना,
कतराना, भाग जाना।
क्यूँ ज़रूरी होता है??
-अंशुल।