महाप्राण, राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की पुण्यतिथि (24.04.1974)
पर उन्हें भावांजलि और उनका पुण्य स्मरण।
दिनकर तुमको शत बार नमन....
हे! शब्दब्रह्म के नित साधक,
मानव के हित के आराधक।
हे! गिरातनय, हे! वाणीसुत,
दैवीय तेज के हे! वाहक।
ख़ुद समय बोलता था लेकर,
तव शब्दावलि का अवलंबन।
दिनकर तुमको शत बार नमन!!
हे महातपस्वी!, तेजपुंज,
साहित्य कला के हे निकुंज!
मानव समाज जब हीन बना,
तुम उभरे बनकर शक्तिपुंज।
नर का सुषुप्त अभिमान जगा,
था दैन्य भाव का किया दमन।
दिनकर तुमको शत बार नमन!!
वीरत्व, प्रखर स्वर परम घोर,
निःसीम ज्ञान, बिन ओर छोर।
अद्भुत प्रतापमय, वाणी ज्यों,
ले स्वयं महासागर हिलोर।
जन गण,को समझाया तुमने,
है तुच्छ हीनता का जीवन।
दिनकर तुमको शत बार नमन!!
राधेय कभी बनकर बोले,
बन कृष्ण ज्ञान के पट खोले।
कुरुकुल के कभी पितामह बन,
कर्तव्य भेद तुमने खोले।
अगणित रचनाओं से हमको,
फिर करवाया इनका दर्शन।
दिनकर तुमको शत बार नमन!!
संघर्षशील जीवन जीकर,
विष सदा विषमता का पीकर।
शिवरूप बने तुम नीलकण्ठ,
जन-जन का क्षत मानस सीकर।
इस परम गरल को अनल बना,
दुष्टों के हित फिर किया वमन।
दिनकर तुमको शत बार नमन!!
तुम अटल, अचल हो महासूर्य,
मृत मानव के जयघोष तूर्य।
कविता नभ के हे विवस्वान!
देदीप्यमान! हे तेजवान!!
हे मित्र ! निराले जन-जन के,
हे शुभचिंतक! इस जन-गण के।
हे राष्ट्रभक्त! हे ज्ञाननिधि!
अविजित योधा जीवन रण के।
हे शब्दपुरुष! हे अजर अमर!
साहित्य धरा के परम शिखर।
तम युक्त जगत को दे प्रकाश,
टूटे मन में उपजाई आस।
इस अतुल अलौकिक भेंट हेतु,
स्वीकार करो ये अभिनंदन।
हममें इतना सामर्थ्य कहाँ??
कुछ सोच लिखें या कह पाएँ!
केवल मन से छू सकते हैं,
तव शुभ्र, अलौकिक , दिव्य चरण।
दिनकर तुमको शत बार नमन!!
- अंशुल।