तुम विदा हुए हो सृष्टि चक्र से,
मन से कैसे जाओगे??
इस भारत भू से विलग हुए,
जन-गण से कैसे जाओगे??
तुमने तो पाई अटल स्तिथि,
गति पाई जो पाए योगी।
लेकिन सोचो ये बिना तुम्हारे,
यहाँ परिस्तिथि क्या होगी??
इन आकुल-व्याकुल नैनों को,
अब त्राण कौन दे पाएगा?
तुम जैसा धरतीसुत धरती,
पर अब शायद ही आएगा??
तुम मुक्त हुए, तुम दूर हुए,
जन-मन से कैसे जाओगे??
तुम थे, तो थी ये आस अटल,
तुम से जय का विश्वास अटल!
तुम नीति नियम के साधक थे,
जन के हित के आराधक थे!
तुम शक्ति-शांति के अनुगामी,
मैत्री सन्देश के वाहक थे।
हे! भीष्म प्रतिज्ञा के पालक,
जन सुख सरिता के संचालक!!
तुम स्थूल रूप में विलग हुए,
चेतन से कैसे जाओगे?? (चेतन मन के संदर्भ में)
हे त्याग! तपस के मूर्त रूप,
हे लोकमान्य! हे पितृरूप!!
हे विद्या, विनय, विवेकवान!
हे! अटल, अडिग, मानव महान!!
हे स्वाभिमान के अनुयायी,
दे रिपु को भी जो अभयदान!
करुणावादी, आदर्शवान,
भारत भू की तुम आन ,बान!
अपने आराध्य राष्ट्र भारत के,
प्रण से कैसे जाओगे??
कविताई के अप्रतिम शिखर,
हे ज्ञानवान! विद्वान प्रखर।।
जन-जन के तुम नेता निश्छल,
निष्ठावादी, तुम अटल, सबल।
वसुधा को ही परिवार मान,
निज सुख को था कर दिया दान।
हे शिवि, दधीचि के अनुगामी,
हे विद्यानिधि! उद्भट ज्ञानी!
ये धरती तुम्हें बुलाती है,
तव सुमिरन में अकुलाती है।
जो भी विधिना का हो विधान,
हमको बस है इतना ही ज्ञान।
तुम सदा रहोगे हर मन में,
भारत माता के कण-कण में।
निष्ठा सेवा के हर प्रण में,
कविता की प्रेरक गुंजन में।
हे कवि! बोलो तुम श्रोता के,
वंदन से कैसे जाओगे??
तुम मुक्त हुए, तुम दूर हुए,
जन-मन से कैसे जाओगे??
-अंशुल तिवारी।