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Wednesday, 22 August 2018

श्री अटल जी का स्मरण

तुम विदा हुए हो सृष्टि चक्र से,
मन से कैसे जाओगे??
इस भारत भू से विलग हुए,
जन-गण से कैसे जाओगे??

तुमने तो पाई अटल स्तिथि,
गति पाई जो पाए योगी।
लेकिन सोचो ये बिना तुम्हारे,
यहाँ परिस्तिथि क्या होगी??
इन आकुल-व्याकुल नैनों को,
अब त्राण कौन दे पाएगा?
तुम जैसा धरतीसुत धरती,
पर अब शायद ही आएगा??

तुम मुक्त हुए, तुम दूर हुए,
जन-मन से कैसे जाओगे??

तुम थे, तो थी ये आस अटल,
तुम से जय का विश्वास अटल!
तुम नीति नियम के साधक थे,
जन के हित के आराधक थे!
तुम शक्ति-शांति के अनुगामी,
मैत्री सन्देश के वाहक थे।
हे! भीष्म प्रतिज्ञा के पालक,
जन सुख सरिता के संचालक!!

तुम स्थूल रूप में विलग हुए,
चेतन से कैसे जाओगे?? (चेतन मन के संदर्भ में)

हे त्याग! तपस के मूर्त रूप,
हे लोकमान्य! हे पितृरूप!!
हे विद्या, विनय, विवेकवान!
हे! अटल, अडिग, मानव महान!!
हे स्वाभिमान के अनुयायी,
दे रिपु को भी जो अभयदान!
करुणावादी, आदर्शवान,
भारत भू की तुम आन ,बान!

अपने आराध्य राष्ट्र भारत के,
प्रण से कैसे जाओगे??

कविताई के अप्रतिम शिखर,
हे ज्ञानवान! विद्वान प्रखर।।
जन-जन के तुम नेता निश्छल,
निष्ठावादी, तुम अटल, सबल।
वसुधा को ही परिवार मान,
निज सुख को था कर दिया दान।
हे शिवि, दधीचि के अनुगामी,
हे विद्यानिधि! उद्भट ज्ञानी!

ये धरती तुम्हें बुलाती है,
तव सुमिरन में अकुलाती है।
जो भी विधिना का हो विधान,
हमको बस है इतना ही ज्ञान।
तुम सदा रहोगे हर मन में,
भारत माता के कण-कण में।
निष्ठा सेवा के हर प्रण में,
कविता की प्रेरक गुंजन में।

हे कवि! बोलो तुम श्रोता के,
वंदन से कैसे जाओगे??

तुम मुक्त हुए, तुम दूर हुए,
जन-मन से कैसे जाओगे??

-अंशुल तिवारी।

Sunday, 19 August 2018

श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भावांजलि

कौन है जिसके लिए,
आकाश है काँधा झुकाए।
कौन है जिसके लिए,
सहमी खड़ी हैं दिग-दिशाएँ।
कौन है जिसके लिए,
धरती थमी सी लग रही है।
कौन है जिसके लिए,
मन में कमी सी लग रही है।
कौन है जिसके लिए,
प्रत्येक जन है धीर खोता,
कौन है जिसके लिए,
व्याकुल नयन हैं, मन है रोता।

कौन है जिसके लिए,
पहिया समय का रुक गया है।
कौन है जिसके लिए,
हर एक मस्तक झुक गया है।
कौन है जिसके लिए,
श्रद्धाविनत संसार है ये।
कौन है जिसके लिए,
सम्मान के उपहार हैं ये।
कौन है जिसके लिए,
दिल में जगह सबके बनी है।
कौन है जिसके लिए,
सबकी विधाता से ठनी है।

कौन है जिसके लिए,
उपमाएँ भी लज्जित खड़ी हैं।
कौन है जिसके लिए,
संज्ञाएँ सब छोटी पड़ी हैं।
कौन है जिसके लिए,
है स्वर्ग भी पलकें बिछाए।
कौन है जिसके लिए,
बाँधे स्वयं को है हवाएँ।
कौन है जिसके लिए,
है शत्रुओं की आँख भी नम।
कौन है जिसके लिए,
जन त्याग निजता हो गए हम।

कौन है जिसके लिए,
सुरलोक में उत्साह अविरल।
कौन है जिसके लिए,
सीधी वहाँ की राह निर्मल।
ये नहीं है और कोई,
भारती का सुत अलौकिक।
जो जिया शालीनता से,
धर्म के पथ पर चतुर्दिक।
था सदा जिसके कथन पर,
सिर सभी ने ही झुकाया।
जिसने अपने नेह से,
जन-जन को था अपना बनाया।

जिसने दृढ़ संकल्प कर यूँ,
पाठ दृढ़ता का पढ़ाया।
विश्व में माँ भारती का,
मान, गौरव था बढ़ाया।
जिसने हरदम मित्रता का,
राग अरिसम्मुख था गाया।
और जग में भारती की,
शक्ति का परचम उठाया।

जिसने संघर्षों के पथ से,
जी कभी था न चुराया।
बढ़ सघन अंधियार में भी,
शांति का दीपक जलाया।
जिसने उत्तम नीति का नव,
पंथ दुनिया को दिखाया।
शत्रुता को जीतने के,
हेतु पहला पग उठाया।

हाय! कैसा दिन?? के लो,
वो जा रहा है, जा रहा है!!
स्वर्ग के देवों सुनो वो!
आ रहा है, आ रहा है!!
हे विधाता! क्या तुझे भी,
आज है उसकी ज़रूरत।
शांति और शक्ति की मिश्रित,
जो अलौकिक दिव्य मूरत।

आज माता भारती की,
आँख भी नम हो गई है।
गिनती उसके वीर पुत्रों,
की पुनः कम हो गई है।
क्या करें हम, कुछ न सूझे,
कुछ नहीं आता समझ है।
पर विधि की कल्पना पर,
चल सका किसका ही वश है।

हो नमन स्वीकार तुमको,
ओ यशस्वी! ओ चिरन्तन!
हम सभी करबद्ध होकर,
कर रहे मनपूर्ण वंदन।
तुम पुनः आओ, के भारत,
को तुम्हारी है ज़रूरत।
तुम से ही उज्ज्वल, धवल है,
भारती की दिव्य मूरत।

है यकीं हमको न तुम ये,
भूमि तज कर जा सकोगे।
भारती के स्नेह को तज,
कर नहीं तुम जा सकोगे।

- अंशल तिवारी।