बस जब से,
ज़िन्दगी का पौधा,
बढ़ने लगा था,
मन तुलनाएँ गढ़ने,
लगा था।
मुझे अब समझ आने लगी थी,
दुनियादारी,
नफ़ा-नुकसान,
अपना-पराया!
समझ आने लगा था कि,
दुनिया में हमारे अलावा भी,
रहते हैं या रहते थे,
"वो लोग"!!!
"वो लोग" जो मुझे कभी भी,
समझ नहीं आए!!!
"वो लोग" जो कहानियों,
का हिस्सा थे,
जो स्वयं एक मुक़म्मल,
किस्सा थे।
कैसे थे "वो लोग"??
कौन थे "वो लोग"??
वो लोग, जो ज़रूरत को,
शौक़ से पहले देखते थे।
वो लोग, जो कुछ नहीं,
फेंकते थे।
वो लोग, जो ज़मीन पर,
बैठकर खाते थे,
वो लोग, जो देहरी के पैर छू कर,
बाहर जाते थे।
वो जिनके घर,
कोई भी आ सकता था,
वो जिनके दर से कोई,
रिक्त नहीं जा सकता था,
मेहमान को जो ,
भगवान-सा ही मानते थे,
जिसे विदाई देते तो,
रास्ते की 2 रोटियाँ बांधते थे।
वो जो किसी के घर आने पर,
पूरियाँ पकाते थे।
स्नेहसिञ्चित मिठाई के,
परात मँगवाते थे।
वो जो "कज़िन" शब्द को नहीं,
जानते थे।
वो जो स्नेह को संबंध की वजह,
मानते थे।
वो जिनके लिए किफ़ायत,
का बड़ा मोल था।
बचत करना,
जिनका उसूल था।
वो जो वक़्त का हिसाब रखते थे,
वो लोग जो यूँही नहीं भटकते थे।
वो लोग, जो कंजूसी दिखाते थे,
पर त्योहारों में दिल खोलकर,
लुटाते थे।
वो जो सालगिरह, जन्मदिन,
बिना कलेंडर याद रख पाते थे।
वो जो पड़ोसी को भी,
अपना कहकर बुलाते थे।
वो जो, दूसरों की ख़ुशी में,
ख़ुश हो जाते थे,
इसी तरह कुछ अपने ग़म,
भूल जाते थे।
वो जो, कपड़ों को,
फटने तक पहनते जाते थे।
लेकिन नया जोड़ा सिर्फ़,
दिवाली में ही सिलाते थे।
वो लोग जो होली पर,
गुझिया बनवाते थे।
घर में ही पकवानों के,
अम्बार लगवाते थे।
वो जो, पैदल चलकर,
बस के पैसे बचाते थे।
वो जो, बचे पैसों की,
टॉफियाँ बच्चों को खिलाते थे।
वो जो, हक़ से डाँटकर,
प्यार दिखाते थे।
बस इसी बात से जो,
उम्रभर याद रह जाते थे।
"वो लोग", जिनका जीना,
जैसे मिसाल था!
जिनकी संघर्ष कथा, कहकर,
घर-आँगन निहाल था।
मेरे आसपास अब,
बहुत कम ही बचे हैं,
"वो लोग"!!!!
वो जो बिन बात सबको,
दुआएँ देते हैं,
वो जो, छोटों की बलाएँ,
ले लेते हैं!!
आधुनिकता की दौड़ में,
आगे बढ़ते ,हारते-जीतते,
जूझते, उलझते!!
मैं समझ चुका हूँ!
हमारे अस्तित्व के लिए,
कितने ज़रूरी हैं,,,
"वो लोग"!!!
वो लोग, जो मिसाल हैं,
वो लोग, जो मशाल हैं!!
-अंशुल तिवारी।
08.10.2018