तुम नहीं हो वृक्ष केवल,
किन्तु तुम इस से परे हो।
भाव के जल से हो सिंचित,
कल्पना के थल खड़े हो।
तुम विचारों की हवाओं,
में सदा ही झूमते हो।
तुम सृजन के मंद झोंकों,
को सदा ही चूमते हो।
कितने अंधड़ सह चुके तुम,
ताप भी कितना सहा है?
मौन रहकर, ही सदा,
संताप भी कितना सहा है?
हाँ अभी हो, तुम पड़े,
माना, धरा में तुम गड़े हो!
पर न भूलो, निश्चयी,
संकल्प में कितने बड़े हो?
वह घड़ी, आएगी जब फिर,
तोड़ सीमाएँ बढोगे!
नव सृजन, की नव कथाएँ,
हाथ से अपने गढ़ोगे!
मौन होकर सृष्टि भी,
देखेगी ये नूतन कहानी!
वृक्ष तुम पा जाओगे,
नव रक्त जब, नूतन जवानी।।
फिर बढ़ोगे, नभ छुओगे,
पात सब होंगे हरे तब।
रस नया, भीतर बहेगा,
तेज से होगे भरे तब।।
-शुभकामनाओं समेत, सादर
अंशुल तिवारी