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Monday, 1 July 2019

हर एक आदमी!!!


इस भीड़ में अनजान है, हर एक आदमी।
इस शहर में मेहमान है, हर एक आदमी।

शोहरत का शहर है यहाँ है रंग की बहार,
फिर भी तो परेशान है, हर एक आदमी।

किस्से हैं यहाँ हर गली, इंसाँ की फ़तह के,
अंदर से पशेमान है, हर एक आदमी।

जिसमें न हैं जज़्बात, वफ़ा, दोस्ती ज़रा,
दुनियावी वो सामान है, हर एक आदमी।

दुनिया में मेरा नाम बड़ा है, वजूद है,
कितना बड़ा नादान है, हर एक आदमी।

ऊपर से ज़िन्दगी के जश्न, रोज़ दिखावे,
अंदर से तो बेजान है, हर एक आदमी।

बाज़ार की रौनक में इतना डूब गया है,
अब खो चुका पहचान है,हर एक आदमी।

सच्चाई, वफ़ा, इश्क़, सभी तो निकल गए,
ख़ाली-सा अब मकान है,  हर एक आदमी।

-अंशुल तिवारी
28.06.19
21:44 (मुम्बई)