सुनी सुनाई, जो बात सुनकर,
बड़े ये आलिम बने हुए हैं!
ये जानते हैं तो क्या जानते हैं?
ये बस चुराकर कहीं से कुछ भी,
या सुन-सुनाकर कहीं से कुछ भी,
ज़माने में पीटते ढिंढोरा,
बिना ज़मीं के खड़े हुए हैं!
न इनके पैरों के नीचे कुछ है,
न इनके होश-ओ-हवास कायम!
ये झूठ को मानकर सच यहाँ पर,
उठाए परचम भटक रहे हैं,
कहाँ पे जाना ये चाहते हैं?
कहाँ पहुँचकर ये दम भरेंगे!
-अंशुल।