ईश वंदना-
हे विघ्ननाशन! गणपति, तुमको नमन प्रारम्भ में,
पश्चात इसके कर रहा, निज कार्य को आरम्भ मैं।
हे शारदे! सादर नमन मेरा तुम्हें स्वीकार हो,
माँ, ज्ञान, बुद्धि, तेज की तुम ही यहाँ आधार हो।
करुणानिधान सुजान, हे श्रीराम! जय-जय आपकी,
मुझको चरण में दो शरण, कर भस्म जड़ संताप की।
हे विश्वमोहन! शेषशायी, जगत के पालक हरि,
मुझ दीन हेतु नेह की, कीजै प्रवाहित सुरसरि।
भूमिका-
भारत अलौकिक भूमि है, अनुपम है इसकी हर कथा,
जो ज्ञान, गुण, विज्ञान से, भरपूर रहती सर्वथा।
जीवन प्रबंधन के लिए, जो भी ज़रूरी तत्व है,
सब इन कथाओं में निहित है, सार-संग्रह, सत्व है।
हम आज ऐसी ही कथा का, कर रहे उल्लेख हैं,
जिसके सभी संदर्भ चर्चा में, विशिष्ट, विशेष हैं।
है कथा बीते काल की, पर नित नई नूतन लगे,
इसमें वचन श्रीकृष्ण के, हैं ज्ञान, मुक्ति में पगे।
ये भाग है उस ग्रंथ का, जिसको रचा मुनि व्यास ने,
पर जन्म इसको है दिया, कुन्तीतनय की प्यास ने।
हाँ बात हम करते हैं, भारत के महाभारत की ही,
जिसमें जड़ी है, दमकती, अति दिव्य 'गीता'-सी मणि।
श्री व्यास ने इसमें लिखी है मनुज की संभावना,
और साथ ही 'गीता' में लिख दी, मुक्ति की प्रस्तावना।
मानव समाज हुआ कृतार्थ, महर्षि के इस कृत्य से,
सब आवरण हर कर, मिलाया जिसने सबको सत्य से।
मुख्य लेख-
है विदित जन को, जब सुयोधन का अहम सर पर चढ़ा,
निज बंधु का अधिकार करने को हनन आगे बढ़ा।
तब कृष्ण ने चेतावनी दे, यह सुनिश्चित कर दिया,
पांडव न होंगे नत, लड़ेंगे धर्म रचने को नया।
इस के अनंतर युद्ध भीषण, दो दलों में ठन गया,
करने विशिख वृष्टि प्रबल, धनु बाँकुरों का तन गया।
लो आ खड़े हो गए सन्मुख, युद्धथल में स्नेहीजन,
हाँ देखकर जिसको धरा क्या, हिल गया किञ्चित गगन।
दोनों ही ओर समर्थ वीरों का लगा भंडार था,
सेना समूह प्रबल, विशिष्ट, समग्र पारावार था।
पलकें बिछाए था खड़ा विध्वंस कुरु के क्षेत्र में,
जैसे महापावक भरा हो, रुद्र के त्रिनेत्र में।
(धृतराष्ट्र-संजय संवाद)
इस परिस्थिति के जनक, भी बैठे थे अपने कक्ष में,
ले साथ संजय सारथी, रण देखने प्रत्यक्ष में।
धृतराष्ट्र तब बोले वचन निज सूत से विस्मय भरे,
मुझको बताओ युद्ध में,कुरु-पाण्डु सुत क्या कर रहे?
संजय ने मुनिवर व्यास से, ये पा रखा वरदान था,
वह महारण को देखने में, हो गया सज्ञान था।
निज नाथ के सुनकर वचन संजय लगा कहने तभी,
हे भरत कुलभूषण! खड़े हैं सज्ज सब योद्धा अभी।
युवराज गुरुवर द्रोण से आ कर वचन हैं कह रहे,
आचार्य किञ्चित पाण्डुपुत्रों की चमू को देखिए।
है द्रुपदसुत सेनापति, संग विकट योद्धा अन्य हैं,
सात्यकि, कुन्तिभोज, भीम, अर्जुन सभी मूर्धन्य हैं।
मैं देखता हूँ कुछ नए तारे उदित हैं हो गए,
सौभद्र के संग द्रौपदीसुत भी रणोन्मुख हो गए।
हे विप्रवर! ये देखिए इस ओर भी क्या ताप है!
हैं भीष्म सेना के पति, धनु संग तत्पर आप हैं।
आचार्य कृप विजयी, विकर्ण, के संग है तव सुत बली,
भूरिश्रवा हैं, साथ है मम मित्र कर्ण महाबली।
हैं वीर अन्या-अन्य जो मेरे लिए जीवन तजें,
हैं रणकुशल ये सब, उचित है शत्रु ईश्वर को भजें।
जिस सैन्य की रक्षा स्वयं गंगातनय हों कर रहे,
है मनुज की तो बात क्या? ख़ुद देव भी उससे डरें।
अतएव, आप विशिष्ट वीरों का समूह बनाईये,
और शीघ्र कुरुसेनापति सेवार्थ ही पहुंचाइए।
तब वीरवर श्री भीष्म ने, कर सिंह की सी गर्जना,
कर शंखध्वनि अति घोर, दे दी शत्रुदल को वर्जना।
पश्चात इसके अनगिनत रण वाद्य मिलकर बज गए,
सुन घोर स्वर उत्पन्न पाण्डव भी तुरत ही सज गए।
सबसे प्रथम श्वेताशव रथ पर, यदुपति ने यह किया,
वातावरण निज शंख के अति घोर स्वर सेे भर दिया।
पा प्रेरणा इसके अनंतर भीम, अर्जुन उठ गए,
धर्माधिपति संग अनुज सब, रणघोषणा में जुट गए।
जब एक संग ही देवदत्तोपौंड्र का स्वर छा गया,
(देवदत्त-अर्जुन का शंख, पौण्ड्र- भीम का शंख)
ऐसा लगा जैसे निमंत्रण काल था तब पा गया।
हर एक योद्धा शंख लेकर घोर ध्वनि था कर रहा,
ज्यों मृत्यु को ललकार, हुँकार ही था भर रहा।
(श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद)
तब अचानक कुंतीतनय यह कृष्ण से कहने लगा,
हे देव! रणथल मध्य में स्यंदन तनिक कीजै खड़ा।
दुर्बुद्ध दुर्योधन के हित चिंतक यहाँ जो आए हैं,
संग्रामस्थल पर श्याम घन की भाँति ये जो छाए हैं।
में देखना हूँ चाहता आए यहाँ पर कौन हैं,
देकर अधम का साथ भी जो ,शस्त्रसज्जित मौन हैं।
श्री कृष्ण भी क्षण एक में, रथ वेग से लेकर चले,
थे जहाँ सज्जितशस्त्र लेकर भीष्म और गुरुवर खड़े।
बोले वचन तब पार्थ से, लो देख लो जो चाहिए,
तेरे हृदय में अब कोई संशय न रहना चाहिए।
अर्जुन ने जब कर लक्ष्य देखा ,कौरवों की सैन्य को,
अत्यंय मर्माहत हुआ, उपलब्ध होकर दैन्य को।
तब ग्रसित होकर शोक से, वह रुदन था करने लगा,
संकल्प जर्जर हो गया, अर्जुन ठगा-सा रह गया।
साहस समेटा पार्थ ने, और वचन भगवन से कहे,
(विधि का कुरूप विधान कोई भी, भला कब तक सहे)।
है नरोत्तम! ये दृश्य कितना है विकट, विकराल है,
निज बंधुओं के शीष ओर फण खोल बैठा काल है।
हर क्षण इन्हें यों देखकर, मन शोक से है जल रहा,
पल-पल कठिन संताप ये, मेरे हृदय में पल रहा।
हर अंग मेरा शिथिल होकर, शक्ति अपनी खो रहा,
अपने सगे-संबंधियों को देख है मन रो रहा।
हे सखा! देखो वो पितामह भीष्म, कुरुकल ज्येष्ठ हैं,
जो प्रेम के सागर हैं और अति वीर योद्धा श्रेष्ठ हैं।
मैं गोद में जिनकी उछल कर बैठ जाता था कभी,
कैसे है सम्भव युद्ध उनसे कर सकूँगा मैं अभी।
जिस वृक्ष की छाया में पलकर सुख अलौकिक था मिला,
हा!! काटने उसको ही विधि ने, कर दिया मुझको खड़ा।
ये भाग्य ने मुझको दिया, कैसा अनोखा दंड है,
ये अत्यधिक दुष्कर है, कितना क्रूर कर्म प्रचंड है।
ये वीरवर, तेजस्वियों में अग्रणी हैं जो खड़े,
क्या-क्या कहूँ उपकार मुझपर, कर चुके कितने बड़े।
हे कृष्ण! सच कहता हूँ, मेरे पास जो भी ज्ञान है,
सब इन्हीं की निश्छल कृपा का ही हुआ परिणाम है।
मैं तो बड़ा निर्बोध था, मुझको न कोई ज्ञान था,
न बोध था निज शक्ति का, न योग्यता का भान था।
मैं तो पड़ा था कोयले-सा, धूल में लिपटा हुआ,
मैं था शिला का खंड बस, अनगढ़, धरा पर था पड़ा।
जिस पल मुझे गुरुदेव ने निज अंक में धारण किया,
जब प्रेम का पावन अमिय, बिन स्वार्थ, बिन कारण दिया।
मैं देखते ही देखते पत्थर से हीरा हो गया,
अज्ञान का तम मेरे जीवन से सदा को खो गया।
अपने परिश्रम से मुझे पाषाण से प्रतिमा किया,
निज पुत्र सा ही जान कर, जाने कहाँ पहुँचा दिया।
मुझको प्रशिक्षण दे, बनाया धनुर्धर सर्वाग्रणी,
मैं रहूँगा पर्यंत जीवन, इस कृपा के हित ऋणी।
संसार ये जिस रूप में पहचानता है अब मुझे,
वह है मेरे गुरुदेव की ही तो दया का फल सखे!
जिसने पकड़कर हाथ, शर संधान सिखलाया मुझे,
सद्धर्म का, सत्कर्म का, सन्मार्ग दिखलाया मुझे।
जिनकी चरण रज को सदा ही शीष पर मैंने रखा,
कैसे कटेगा शीष उनका हाथ से मेरे भला??
जिस कण्ठ ने मुझको सदा, जय का दिया आशीष था,
किस भाँति उसको बाण से, मैं बींध दूँगा अब भला??
गुरुद्रोह का ही पाप भीषण है, मुझे यह ज्ञात है,
गुरुवध मुझे करना पड़े ,ये तो सघन संताप है।
इससे कहीँ भी हो सकेगा त्राण तो मेरा नहीं,
इस दुःख न मुक्त होगा प्राण ये मेरा कहीँ।
हे कृष्ण! यह सब देख के, है धनुष कर से छूटता,
ये युद्ध का संकल्प होकर क्षीण, अब है टूटता।
मुझको न तो जय चाहिए, न राज्य का ही सुख अहो!
क्या लाभ है? निज बंधुओं को मारने में फिर कहो??
ये हाय! हैं परिवार जन, निज तातसुत, मातुल, सुजन,
हैं भाई, भ्रातृज, श्वसुर हैं, गुरु हैं, पितामह, श्रेष्ठजन।
त्रैलोक्य के भी राज्य हित, इनको नहीं मारूँगा मैं,
कर पुण्य अपना क्षय, कुपथ पर पग नहीं धारूँगा मैं।
ये लोभ ज्वर से ग्रसित हैं, इनको नहीं कुछ भान है,
क्या कर रहे, क्या कर चुके, इनको न इसका ज्ञान है।
लेकिन कृपा से आपकी हम हो गए सज्ञान हैं,
संग्राम हितकारी नहीं होता, हमें यह ध्यान है।
फिर आप क्यों इस पाप में हमको फँसाते हैं प्रभो??
इस घोर दूषित कर्म में, हमको लगाते हैं प्रभो!!
संजय उवाच-
हे नृप! ये कहकर पार्थ ने है, रख दिया अपना धनुष,
रथ पृष्ठ में वह हैं गए, होकर दुखी, रण से विमुख।
।।प्रथमोध्याय समाप्त।।