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Monday, 10 September 2018

"दीवारों की ठंडक"

हर घर समय के साथ बदलता है, उसके हालात बदलते हैं।
इस नए-पुराने की कश-म-कश में जीत नए की होती है, और वो जो पुराना होता है चुपचाप बिठा दिया जाता है चकाचौंध से दूर, घर के एकांत कोने में।
हमारे घरों में अक्सर पुरानी चीजों/ यादों को संभालने की ज़िम्मेदारी आ जाती है....बरामदे में सबसे पीछे बने एक छोटे से कमरे पर (स्टोर रूम)....
आइए आज उस कमरे में चलें जो निःशब्द बना कितने वर्षों से मेरे/ आपके घर की यादें सहेज रहा है....जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं!!!

"दीवारों की ठंडक"

मुझे याद है आज भी,
बात मेरे बचपन की,
पसीने से लथपथ हुआ,
भागते-भागते जब कभी।

पहुँच जाता था मैं, अपने घर के उस,
अनजाने बंद कमरे में!!
घर के बरामदे में,
सबसे पीछे बने उस कमरे में।
वो कमरा,
जो ज़्यादा बड़ा नहीं था,
छोटा ही था, और अक्सर,
बंद रहा करता था।

घर में कोई न था,
उसे पूछनेवाला,
जो करता देखभाल उसकी।

सारे घर में पसरा कोलाहल भी जैसे,
ख़त्म-सा हो जाता था,
इसकी चौखट तक आकर।

और ये,
बेजान-बेज़ुबान बना,
यूँही खड़ा रहता था,
अपने बोझ को उठाए।

सम्भवतः, पिछली दीवाली से,
कोई आया भी नहीं था यहाँ।
और इसलिए पड़ चुकी थी धूल,
उन यादों पर,
जो रह रहीं थीं इस कमरे में,
अकेले, जाने कब से???

यादें जो वक़्त के साथ बदलते,
हालातों की कहानी थीं।
ज़िंदा जज़्बातों की बयानी थीं।

रखे थे वहाँ कुछ पुराने रौशनदान,
टूटी लकड़ी की कुर्सियाँ,
और हाल में बदली गई एक चारपाई।

कुछ गुज़रे हुए चेहरे भी,
दीवारों पर टँगे थे...तस्वीरों में क़ैद।
शायद इसलिए,
कि अब ड्रॉइंग रूम की शोख़ दीवार पर,
वे अच्छे नहीं लगते।
या इसलिए, कि वे नहीं कर पाए बराबरी,
वक़्त की रफ़्तार से....!!

अब जो पीढ़ी यहाँ रहती है,
वो उन्हें जानती तक नहीं है।
न वे लोग अब पाए जाते हैं,
कहानियों में ही...!!
वे लोग छूट गए हैं बहुत पीछे...
ज़िन्दगी, आगे निकल आई है।

सुना है!! यही घर का वो पहले कमरा था,
जिसकी ईंटों की जुड़ाई में,
चूने के साथ मिला था, बाबा का पसीना भी।

इसकी ये ऊँची छत, टिकी थी उन्हीं के,
ज़िम्मेदार कांधों पर।

सुना है!! इसे बड़े शौक से रँगवाया गया था,
सारी गली में दावत हुई थी उस रोज़!!

और अब,
बाकी पूरा घर पक्का कंक्रीट का बन गया है,
....शायद इसमें रहने वाले भी...
पैर रखने के लिए भी अब,
शफ्फ़ाक संगमर्मर बिछा है हर ओर!!

पर शायद इस कमरे की ऊबड़खाबड़,
फ़र्श और सीलन भरी दीवारों से,
आज भी मिलती है,
एक अजीब-सी, ठंडक।
ऐसी ठंडक जो अक्सर पाई जाती है,
किसी उम्रदराज़ बरगद की छाँह में,
मित्र की बाँह में,
माँ के आँचल में, या बुज़ुर्गों के साए में।

मैं, इसीलिए मौका मिलते ही,
मॉडर्न कंस्ट्रक्शन की ज़द से निकलकर,
आ बैठता हूँ!!

घर के बरामदे में सबसे पीछे बने,
इस टूटे-फूटे फ़र्श वाले,
पुराने कमरे में,
कुछ देर ही सही, मगर

इस झुलसाती और सुलगाती,
दुनिया से निजात पाने।

- अंशुल तिवारी
09.09.18

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