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Friday, 27 November 2020

वो क्या कोई कवित्त है?

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो चित्त को जला-जला के राख-राख कर गया,
जो चैन, शांति, प्रेम, धैर्य, औ' सौहार्द हर गया!
जो जन्मते ही दम्भ के गहन तिमिर में खो गया,
जो बोध के नयन को मूंद कुरूपति-सा हो गया!
जो अपने लाभ के लिए सभी नियम भुला गया,
जो नीति, तथ्य और विवेक को समूल खा गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो मानवों को मानवों का शत्रु ही बना गया,
जो मोहरों की भाँति उनको साथ में लड़ा गया!
जो अग्नि वैमनस्य की समाज में जला गया,
के जिसके हाथ से हरेक आदमी छला गया!
जो शांति की सुधा छुड़ा के वैर विष पिला गया,
जो सत्य, स्नेह, मित्रता की नींव को हिला गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो मुझमें अहंकार को जगा गया, जगा गया,
हूँ सर्वश्रेष्ठ मैं ये मेरे कान में बता गया!
जो मुझको बोध पथ से सर्वथा ही दूर कर गया,
के जिसके जन्मने से मन में द्वेष भाव भर गया।
जो मुझको आत्मवन्दना की होड़ में लगा गया,
जो ज्ञान मूल को उखाड़ धूल में मिला गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?

कवित्त वो जो है, जो भरे मनुज के मन को धीर से,
जो आत्म को करे सुपुष्ट, ज्ञान गंग नीर से।
जो चित्त में भरे सदा ही शांति, अनुराग को,
जगाए जो स्वतः ही शुद्ध त्याग को, विराग को।

कवित्त क्या जो माँगता हो जग से भीख मान की,
किसी से वाह-वाह की, किसी से निज प्रमाण की।

-अंशुल।

Wednesday, 25 November 2020

उन्मुक्त स्वर।

न मुझको दान चाहिए, न मुझको त्राण चाहिए,
न मैं के वो जो झोलियों में डालकर के पंक्तियाँ,
फिरूँ यहाँ गली-गली, के सिर्फ़ एक दाद पर,
लुटा दूँ अपने आप को, बिछा दूँ अपने आप को!
न मुझको दाद चाहिए, न मुझको वाह चाहिए,
के तुम जो अपने आप से भी झूठ ही हो बोलते,
न आईने में देखते, न ख़ुद को ही हो तोलते!!
तुम्हें वही पसंद है, जो है तुम्हारे काम का,
तुम्हें तो झूठ भावते, हो सच से तुम तो भागते,
तुम्हें तो तृप्तिकर है लगती बस तुम्हारी वन्दना,
अगर कहे कोई के तुमने की है जो भी वंचना!
तो शत्रु मानकर उसे न झेल पाओगे कभी,

मैं क्यूँ तुम्हारे सामने पड़ा रहूँ, खड़ा रहूँ,
हो कौन तुम, क्या जानते हो??
क्यूँ तुम्हारी इक फ़िज़ूल दाद पे मैं मर मिटूँ!
नहीं ये मेरे योग्य है...
मुझे न दाद चाहिए, मुझे न वाह चाहिए...
मैं मुक्त स्वर, मैं हूँ गगन, मैं भेद से रहित पवन,
मैं छंद में स्वच्छन्द, लेखनी का आत्मब्रह्म हूँ,
मैं बंजरों में गीत की नदी को मोड़ लाऊँगा,
मैं पत्थरों को फूल की कली से तोड़ जाऊँगा।
मैं क्षण में सृष्टि का सृजन, मैं क्षण में हूँ महाप्रलय,
मैं कल्प के भी पार हूँ, कभी हूँ एक पल में लय।
मुझे ज़रा बताओ गर जो तुम में कोई बात है,
तुम्हारी क्या बिसात है, तुम्हारी क्या बिसात है?

-अंशुल।