वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो चित्त को जला-जला के राख-राख कर गया,
जो चैन, शांति, प्रेम, धैर्य, औ' सौहार्द हर गया!
जो जन्मते ही दम्भ के गहन तिमिर में खो गया,
जो बोध के नयन को मूंद कुरूपति-सा हो गया!
जो अपने लाभ के लिए सभी नियम भुला गया,
जो नीति, तथ्य और विवेक को समूल खा गया।
वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो मानवों को मानवों का शत्रु ही बना गया,
जो मोहरों की भाँति उनको साथ में लड़ा गया!
जो अग्नि वैमनस्य की समाज में जला गया,
के जिसके हाथ से हरेक आदमी छला गया!
जो शांति की सुधा छुड़ा के वैर विष पिला गया,
जो सत्य, स्नेह, मित्रता की नींव को हिला गया।
वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो मुझमें अहंकार को जगा गया, जगा गया,
हूँ सर्वश्रेष्ठ मैं ये मेरे कान में बता गया!
जो मुझको बोध पथ से सर्वथा ही दूर कर गया,
के जिसके जन्मने से मन में द्वेष भाव भर गया।
जो मुझको आत्मवन्दना की होड़ में लगा गया,
जो ज्ञान मूल को उखाड़ धूल में मिला गया।
वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
कवित्त वो जो है, जो भरे मनुज के मन को धीर से,
जो आत्म को करे सुपुष्ट, ज्ञान गंग नीर से।
जो चित्त में भरे सदा ही शांति, अनुराग को,
जगाए जो स्वतः ही शुद्ध त्याग को, विराग को।
कवित्त क्या जो माँगता हो जग से भीख मान की,
किसी से वाह-वाह की, किसी से निज प्रमाण की।
-अंशुल।