न मुझको दान चाहिए, न मुझको त्राण चाहिए,
न मैं के वो जो झोलियों में डालकर के पंक्तियाँ,
फिरूँ यहाँ गली-गली, के सिर्फ़ एक दाद पर,
लुटा दूँ अपने आप को, बिछा दूँ अपने आप को!
न मुझको दाद चाहिए, न मुझको वाह चाहिए,
के तुम जो अपने आप से भी झूठ ही हो बोलते,
न आईने में देखते, न ख़ुद को ही हो तोलते!!
तुम्हें वही पसंद है, जो है तुम्हारे काम का,
तुम्हें तो झूठ भावते, हो सच से तुम तो भागते,
तुम्हें तो तृप्तिकर है लगती बस तुम्हारी वन्दना,
अगर कहे कोई के तुमने की है जो भी वंचना!
तो शत्रु मानकर उसे न झेल पाओगे कभी,
मैं क्यूँ तुम्हारे सामने पड़ा रहूँ, खड़ा रहूँ,
हो कौन तुम, क्या जानते हो??
क्यूँ तुम्हारी इक फ़िज़ूल दाद पे मैं मर मिटूँ!
नहीं ये मेरे योग्य है...
मुझे न दाद चाहिए, मुझे न वाह चाहिए...
मैं मुक्त स्वर, मैं हूँ गगन, मैं भेद से रहित पवन,
मैं छंद में स्वच्छन्द, लेखनी का आत्मब्रह्म हूँ,
मैं बंजरों में गीत की नदी को मोड़ लाऊँगा,
मैं पत्थरों को फूल की कली से तोड़ जाऊँगा।
मैं क्षण में सृष्टि का सृजन, मैं क्षण में हूँ महाप्रलय,
मैं कल्प के भी पार हूँ, कभी हूँ एक पल में लय।
मुझे ज़रा बताओ गर जो तुम में कोई बात है,
तुम्हारी क्या बिसात है, तुम्हारी क्या बिसात है?
-अंशुल।
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