ये उनको लग रहा होगा!
मेरा होगा क्या? क्या होगा?
जो चिंतामग्न हैं,मेरे लिए,
ये सोचकर शायद, मैं हूँ किस काम का आख़िर!
तो, मैं उनसे ये कहता हूँ,
अजी! इस बात में भी क्या भला,
रक्खा है? क्या रक्खा?
न ख़ुद को कष्ट दो,
मुझको, मेरे ही हाल पर छोड़ो,
भले ही राख से हूँ जो ढँका,
ठंडा नहीं समझो,
अगर इतराओगे, मुझको उठाकर,
खेल समझोगे, ज़रा-सी बस हवा छूकर,
मैं चमकूंगा सितारे-सा, तुम्हारे हाथ,
जल जाएँगे, आँखें चुँधिया जाएँगी,
मेरी रौनक, चमक और तेज से,
सुलगोगे, दहकोगे...
इसी को जानकर मैं कह रहा,
तुमको है क्या करना ??
तुम अपने दिल, दिमाग़ में,
बस यही एक बात बैठा लो,
तुम्हारी झूठ से लबरेज़,
फ़िकर जो है दिखावे की,
इसे अपने ही तक रक्खो,
रहो तुम भी, मुझे भी और सुकूँ से,
यार रहने दो..
न सोचो मेरे बारे में, न सोचो मेरे बारे में!
-अंशुल।