बाज़ार की ये मांग है, तुम वो लिखो जो बिक सके,
जो बिका नहीं बाज़ार में, बेकार है! बेकार है!
तुम जो भी लिखते हो यहाँ, उसे अपने हाल पे छोड़ दो।
बाहर चलो, बाज़ार में, देखो दुकानों में सभी,
क्या-क्या सजा है, तैयार है, बिक जाने को बेकरार।
तुम भी लगाओ बोलियाँ, बाज़ार का अंदाज़ लो।
अब मोल-भाव को देखकर, अपने लिखे का स्मरण करो।
सोचो इसी बाज़ार इक दुकान हो जो तुम्हारी भी,
तुम भी खड़े हो धूप में, कितना बिकोगे अब कहो?
बेचोगे कैसे लिखा हुआ? क्या फ़ायदे बतलाओगे?
तुमने लिखा जो भी यहाँ, उसमें हैं बस कड़वाहटें!
दुनिया की असली शक्ल है, पर ये किसे रास आएगी!!
लोगों को तो भाती है बस, शब्दों की मीठी चाशनी,
या चट-पटी बातें, मसालेदार-सी छींटा-कशी!
ये सब तुम्हारे कहन में तो है नहीं , बिल्कुल नहीं!
फिर कौन पैसे ख़र्च कर, ए यार! तुमको ख़रीदेगा,
तुम अपने घर वापस चलो, फिर से अकेले बैठकर,
इस हाल पर भी कुछ लिखो, तुम अपने सच को ही लिखो!
अब कोशिशें भी मत करो, कि वो लिखो जो बिक सके!!
-अंशुल।
22.01.21
(हरिद्वार)
एक आग है तुम्हारी कविताओं में अंशुल।
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