भिन्न देह एक प्राण,
प्रेमी, अद्भुत, महान।
शारदेय, ज्ञान निधि,
दैवी सामर्थ्यवान।
कविकुल की आन-बान,
दिनमणि से तेजवान।
स्नेह को अपने फिर भी,
जीवन भर रखा गुप्त।
'बच्चन' घर गए 'मुक्त'...
गंगा-सी थी तरंग,
चलते थे संग-संग।
संगम की धार से थे,
एक रूप और अभंग।
नूतन करते प्रसंग,
रमते थे एक रंग।
मित्रता अनोखी थी,
शीतल सुगंध युक्त।
'बच्चन' घर गए 'मुक्त'...
आज खिले होंगे फिर,
दोनों के ही अंतर।
देवधाम में होगी,
अद्भुत आभा प्रखर।
मित्रों का मिलन देख,
देव नत हुए होंगे।
पुष्प लुटाते होंगे,
अंजुलियाँ भर-भर कर।
बरसों के बाद आज,
बंधु के घर बंधु गए।
देख दृश्य ये पावन,
मन के छिड़ तार गए।
नयनों का नीर जगा,
अब तक था जो प्रसुप्त।
'बच्चन' घर गए 'मुक्त'।
- अंशुल।