hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Friday, 19 January 2024

'बच्चन' घर गए 'मुक्त'..

भिन्न देह एक प्राण,
प्रेमी, अद्भुत, महान।

शारदेय, ज्ञान निधि,
दैवी सामर्थ्यवान।

कविकुल की आन-बान,
दिनमणि से तेजवान।

स्नेह को अपने फिर भी,
जीवन भर रखा गुप्त।

'बच्चन' घर गए 'मुक्त'...

गंगा-सी थी तरंग,
चलते थे संग-संग।

संगम की धार से थे,
एक रूप और अभंग।

नूतन करते प्रसंग,
रमते थे एक रंग।

मित्रता अनोखी थी,
शीतल सुगंध युक्त।

'बच्चन' घर गए 'मुक्त'...

आज खिले होंगे फिर,
दोनों के ही अंतर।

देवधाम में होगी,
अद्भुत आभा प्रखर।

मित्रों का मिलन देख,
देव नत हुए होंगे।

पुष्प लुटाते होंगे,
अंजुलियाँ भर-भर कर।

बरसों के बाद आज, 
बंधु के घर बंधु गए।

देख दृश्य ये पावन,
मन के छिड़ तार गए।

नयनों का नीर जगा,
अब तक था जो प्रसुप्त।

'बच्चन' घर गए 'मुक्त'।
- अंशुल।

Tuesday, 9 January 2024

धनुष भंग

उठो हे राम!
अब उठकर धनुष,
संधान कर लो !!
ज़रा देखो खड़ी हैं,
जानकी कर में लिए,
जयमाल सुंदर, 
दुलारी जनक की देखो तनिक, व्याकुल बड़ी है!! 
प्रतीक्षारत, विकल है, और ये कब से खड़ी है!!
नयन का धीर खोता जा रहा है!
हृदय गम्भीर होता जा रहा है!
तुम्हें टेढ़ी नज़र से देखती है,
झुकाए सर यूँ फिर कुछ सोचती है।
मनाती गणपति को हाथ जोड़े!
खड़ी है चुप, है सर पर शील ओढ़े।
लिया था जन्म तुमने तो,
सभी सन्ताप हरने को ,
तो क्यूँ फिर यूँ जनक का,
ताप अब हरते नहीं हो।
उठो रघुवंशियों में,
सूर्य के प्रतिरूप राघव,
उठो अब जानकीवल्लभ कहाओ,
जनक का शोक, सीता की विकलता,
धनुष के साथ जाकर तोड़ आओ।

-अंशुल।