उठो हे राम!
अब उठकर धनुष,
संधान कर लो !!
ज़रा देखो खड़ी हैं,
जानकी कर में लिए,
जयमाल सुंदर,
दुलारी जनक की देखो तनिक, व्याकुल बड़ी है!!
प्रतीक्षारत, विकल है, और ये कब से खड़ी है!!
नयन का धीर खोता जा रहा है!
हृदय गम्भीर होता जा रहा है!
तुम्हें टेढ़ी नज़र से देखती है,
झुकाए सर यूँ फिर कुछ सोचती है।
मनाती गणपति को हाथ जोड़े!
खड़ी है चुप, है सर पर शील ओढ़े।
लिया था जन्म तुमने तो,
सभी सन्ताप हरने को ,
तो क्यूँ फिर यूँ जनक का,
ताप अब हरते नहीं हो।
उठो रघुवंशियों में,
सूर्य के प्रतिरूप राघव,
उठो अब जानकीवल्लभ कहाओ,
जनक का शोक, सीता की विकलता,
धनुष के साथ जाकर तोड़ आओ।
-अंशुल।
No comments:
Post a Comment