ये व्यंग केवल मनो विनोद के दृष्टिकोण से लिखा गया है।
एक सामान्य प्रस्तुति है। इसे इसी भावना के साथ लिया जाए।
व्यंग- बहू चाहिए।।
सुनो सुनो भई ध्यान लगाकर, खोलो कर्ण के द्वार।
Market फिर से सबल हुआ है, बदल गयी सरकार।
नया trend अंदाज़ पुराना, फिर आया एक बार।
नए नवेले पढ़े लिखों की, हो गयी है भरमार।
करें आप भी इसमें invest, गर्म है ये बाज़ार।
धूम धाम से लौटा है ये परिणय का त्यौहार।
अपने अपने products लेकर, खड़े हैं पालनहार।
Matrimonial book हैं, marriage bureau भी बेज़ार।
जित देखूँ तित लोग खड़े हैं, लंबी करे कतार।
अपना नंबर कब आयेगा, करते इंतज़ार।
अगला नम्बर चौबे जी का, सेवक रहा पुकार।
सुनके उनके बुझे बुझे मुखड़े पे थी चमकार।
भीतर आके देखा तो था सजा हुआ दरबार।
खड़े हुए थे फरियादी सब ले करके दरकार।
सोचा पहल करें खुद ही थे चौबे जी तैयार।
दृढ निश्चय के साथ बढे, counter पे आखिरकार।
बड़े गर्व से गरज के बोले, बहू चाहिए सुन्दर।
काम काज में तेज़ रहे, सद्गुण हों सारे अंदर।
मीठी बोली कोयल सी हो, नीति रीति में लीन।
प्रजातंत्र को न माने, जो रहे राज्य आधीन।
बुद्धि से हो सरस्वती, हो लक्ष्मी का जो रूप।
लाना हो जो साथ लाये, अपनी इच्छा अनुरूप।
सुंदरता हो परम दिव्य, नित पहने नया जो गहना।
और ब्याह उपरांत लाए संग, बस तो फिर क्या कहना।
किन्तु ध्यान ये रखना उसको हो न गया बहकाया।
और न उसपर हो "काली" या "दुर्गा" रूप की छाया।
गौमाता सी शीलवती हो, रहे जो शीष झुकाय।
क्रोधहीन, इच्छाविहीन, मुनियों सा समय बिताए।
डॉक्टर हो, engineer हो, या management की ज्ञाता।
बड़ी कुशलता से घर का सब काम हो करना आता।
चाहे पढ़ी लिखी हो जितनी, नाम भी खूब कमाए।
पर technical प्रज्ञा अपनी, "चौके" में अजमाए।
नहीं रूढ़ी के वादी हम, हैं परम्परा के पालक।
करें नहीं अन्याय कभी हम धर्म ध्वजा के धारक।
नर और नारी में न करते किसी विधि हम भेद।
पर पति से है ज़्यादा तनख़्वाह, इतना ही है खेद।
और नारी के लिए भी है तो सरल मार्ग बतलाया।
मुक्त हुई वह ललना, जिसने घर में ध्यान लगाया।
इसीलिए हम कहते, काहे नौकर किसी का बनना।
करो धर्म का पालन, के सौभाग्य है सेवा करना।
और है अंतिम आस यही वो हमको स्वर्ग दिलाये।
नेत्र बंद होने से पहले, "पौत्र" का मुख दिखलाये।
ये सारे गुण हों उसमे, ये बात बड़ी है नेक।
किन्तु चाहिए, बड़ा ज़रूरी, सुनो!! विशेषण एक।
सुत को अपने कितनी निष्ठा से हमने पढ़वाया।
Donation की भेंट चढ़ा के degree तक पहुँचाया।
नहीं चाहते हम दहेज़, करते हैं सख्त विरोध।
पर नहीं मिलेगा लड़का ऐसा, देखें करके शोध।
हमें चाहिए ये के गुणों का आप करें सम्मान।
और जगत को बस दे दें, इसका एक लघु प्रमाण।
किसी बड़ी building में खुलवा दें उसका एक दफ्तर।
फिर देखें क्या गर्व करेंगे आप भी उसके ऊपर।
ऐसे जामाता को पाकर धन्य पीढियां होंगी।
कर बखान सौभाग्य का अपने, बस कृतार्थ वे होंगी।
चौबे जी की सुन अभिलाषा, आह!! उठी इक मन से।
डूब मरो रे नीच!! जो जीते रक्त चूसकर तन से।
है धिक्कार जन्म को तेरे, माँ की कोख लजाए।
पितरों को अभिशप्त करे, कुल पे कलंक लगवाए।
क्षमा प्रार्थना-
क्षमा चाहता हूँ मैं जो कुछ हुआ हो मुझसे दोष।
नहीं आप पर हे समाज!!, दुर्जन पर है ये रोष।
-अंशुल।।
निवेदन-
व्यंग को व्यंग की तरह ही लें और आनंद उठायें।।