शहर से घर लौट रहा हूँ,
सोच रहा हूँ,
क्या ले जाऊँ घर, घरवालों के लिए,
माँ के लिए...पापा के लिए....
फिर सोचा कि,
अब तो घर के आस-पास भी
सब मिल ही जाता है।
वो सब कुछ जो ज़रूरी होता है।
या ज़रूरी न हो तो भी मिल जाता है।
सजावट का सामान,
साड़ियाँ, कीमती कपड़े, सब कुछ।
smart phone, accessories वगैरह।
फिर क्या ले जाऊँ, समस्या गंभीर है??
शायद वक़्त???
हाँ, सबकुछ तो है सिर्फ वक़्त नहीं मिलता!!
सोचता हूँ इस बार, घर वालों के लिए,
ये वक़्त ही ले जाऊँ,
कुछ बातें, कुछ किस्से, कुछ मीठी नोक-झोंक,
कुछ चुटकुले, कुछ रात, कुछ दिन, कुछ पल।
हाँ, अब उन्हें भी मुझसे यही चाहिए।
बस तय हो गया,
इस दिवाली, मैं घर ले जा रहा हूँ,
वक़्त, मेरा वक़्त, उनका वक़्त...
-अंशुल।
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