मुझे बचपन से सिखा दिया गया था,
फ़र्क जीतने का और हारने का।
और मैं भी ये समझ गया था,
कि मेरे जीतने और हारनेे के मापदंड,
तय वो करेंगे,
जो मुझे जानते ही नहीं,
जिनके लिए मेरे अस्तित्व का कोई सकारात्मक,
मोल नहीं था।
कोई value नहीं थी।
वे तो बस अपनी स्वतंत्रता रखते थे,
ये निर्णय करने की, कि मैं कौन हूँ?
और क्या हो सकता हूँ?
वो जिन्होंने कभी मुझसे बात तक नहीं की,
या कि कभी पूछा मेरा हाल।
और मैं भी बिन समझे,
जुट गया, बलात थोपे हुए दायित्वों,
मापदंडों, अपेक्षाओं को ढोने में।
खच्चरों की तरह, हाँका जाने लगा,
एक ही ढर्रे में।
लेकिन भरपूर कोशिश करके भी,
में असफ़ल ही रहा,
नाकारा ही रहा।
भला ये कैसे संभव है??
कि मछली कोशिश करके,
सीख जाए उड़ना,
या, परिंदे अभ्यास कर लें तैरने का।
पर मैंने कोशिश नहीं छोड़ी,
लगा रहा, जुटा रहा,
क्योंकि मैंने ये भी समझा था,
कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
ये सत्य भी है!!
मेरी कोशिश घिस-घिस के चमक रही है अब।
और चमकेगी...
उनके मापदंडों के अनुसार अब,
मैं जीत रहा हूँ।
क्या वाकई???
पता नहीं ये जीतने वाला में ही हूँ,
या है और कोई, मेरी ही शक़्ल में???
-अंशुल।
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