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Monday, 29 January 2018

जब से यहाँ जज़्बात की कीमत नहीं रही।

जब से यहाँ जज़्बात की कीमत नहीं रही,
हमको भी बोलने की आदत नहीं रही।

हर कोई चाहता है सिर्फ़ ख़ूबसूरती,
सूरत तो चमक उट्ठी, सीरत नहीं रही।

दफ़्तर का मुलाज़िम है हर आदमी यहाँ,
दो पल भी किसी को, फ़ुर्सत नहीं रही।

हर इक ज़ुबान जैसे, तलवार बन गई है,
लहजे में किसी के भी नज़ाकत नहीं रही।

जी जान लगा कर भी न तोड़ पाए जिसको,
ज़ंजीर है नाज़ुक पर, ताक़त नहीं रही।

भागा था जिसके पीछे अपनों से छुड़ा दामन,
वो छोड़ गई तुझको ,शोहरत नहीं रही।

है ख़्वाहिशें भी बाकी, दुनिया को बदलने की,
पर कोशिशें करने की, हिम्मत नहीं रही।

Sunday, 28 January 2018

गणतंत्र दिवस

26 जनवरी, हाल ही में बीती है। इसे अक्सर छुट्टी के दिन की तरह मनाया जाता है।
तो चलें गणतंत्र मनाएँ....(एक व्यंग)

आओ हम गणतंत्र मनाएँ,
आओ हम गणतंत्र मनाएँ।

आज याद इतिहास को कर लें,
देशभक्ति के गीत बजाएँ।
सुबह उठें , नए कपड़े पहनें,
पार्क में जा लड्डू बँटवाएँ।...आओ हम गणतंत्र मनाएँ।

आज तिरंगा badge लगाकर,
देशभक्ति का proof दिखाएँ।
अपनी whatsapp DP बदलें,
सच्चे देशभक्त कहलाएँ।...आओ हम गणतंत्र मनाएँ।

कचरा आज न सड़क पे डालें,
थोड़े सहनशील बन जाएँ।
Colony में पकड़ किसी को,
रटा-रटाया speech सुनाएँ।...आओ हम गणतंत्र मनाएँ।

याद शहीदों को फिर कर के,
पोहे और जलेबी खाएँ।
अपनी संस्कृति को खुद भूलें,
पर औरों को याद कराएँ।

आओ हम गणतंत्र मनाएँ।

बस अधिकारों की ही सुधि लें,
और अपने कर्तव्य भुलाएँ।

(उपरोक्त कविता केवल एक व्यंग है, इसे तदानुसार ही स्वीकारें)

-अंशुल।

Monday, 22 January 2018

कविता जीना सिखलाती है!!

जब जीवन रवि पर श्याम घटा छाती है,
जब गहन तिमिर में ज्योति बुझी जाती है।
जब काल-चक्र से विस्मृत मैं होता हूँ,
कविता तब मुझको जीना सिखलाती है।

जब दिन ढलता है, रात निकट आती है,
जो साथ ही अपने, प्रश्न विकट लाती है।
मैं खड़ा निरुत्तर जब धीरज खोता हूँ,
कविता तब मुझको उत्तर बतलाती है।

जब भी विपदाओं की आँधी चलती है,
शंकाएँ बनकर चक्रवात बढ़ती हैं।
मैं विचलित हो जब ठौर नहीं पाता हूँ,
कविता तब बनकर ढाल उभर आती है।

जीवन रण में जब भी विभ्रम होता है,
जब मोह ग्रस्त हो, मन धीरज खोता है।
जब धनुष फेंक, मैं लक्ष्य-भ्रष्ट होता हूँ,
कविता मुझको बन 'गीता' समझाती है।

जब सोग, दुःख की छाया गहराती है,
मन की निर्बाध तरंगें, थम जाती हैं।
मैं हतप्रभ, हतविश्वास-सा जब होता हूँ,
कविता तब मन को रस से भर जाती है।

ले गोद में अपनी, व्यथित शीष को मेरे,
अपने हाथों से किञ्चित सहलाती है।
देती मुझको विश्वास अटल है, जय का,
मेरे कातर अंतर को बहलाती है।

है रक्षा करती शोक, दुःख से,भय से,
दे त्राण अलौकिक, मुझको वो जाती है।
जब काल-चक्र से विस्मृत मैं होता हूँ,
कविता तब मुझको जीना सिखलाती है।

- अंशुल।

यहाँ राहों में जो कोहरा घना है....

यहाँ राहों में जो कोहरा घना है, शहर के वास्ते किसने चुना है?

जहाँ देखो पड़ी है, गाँठ कोई, ये ताना इस क़दर किसने बुना है?

शहर में बन गया कानून कैसा? कहे जो सच वही बस अनसुना है।

जो डूबा है, वही तैरा यहाँ पर, ये क़िस्सा हमने, माझी से सुना है।

कहाँ ले जाएँगी राहें तुम्हें ये?, सफ़र बोलेगा जो तुमने चुना है।

कहें क्या?? तुम तो सबकुछ जानते हो, मेरी चुप्पी को भी तुमने सुना है।

- अंशुल।