यहाँ राहों में जो कोहरा घना है, शहर के वास्ते किसने चुना है?
जहाँ देखो पड़ी है, गाँठ कोई, ये ताना इस क़दर किसने बुना है?
शहर में बन गया कानून कैसा? कहे जो सच वही बस अनसुना है।
जो डूबा है, वही तैरा यहाँ पर, ये क़िस्सा हमने, माझी से सुना है।
कहाँ ले जाएँगी राहें तुम्हें ये?, सफ़र बोलेगा जो तुमने चुना है।
कहें क्या?? तुम तो सबकुछ जानते हो, मेरी चुप्पी को भी तुमने सुना है।
- अंशुल।
No comments:
Post a Comment