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Monday, 22 January 2018

कविता जीना सिखलाती है!!

जब जीवन रवि पर श्याम घटा छाती है,
जब गहन तिमिर में ज्योति बुझी जाती है।
जब काल-चक्र से विस्मृत मैं होता हूँ,
कविता तब मुझको जीना सिखलाती है।

जब दिन ढलता है, रात निकट आती है,
जो साथ ही अपने, प्रश्न विकट लाती है।
मैं खड़ा निरुत्तर जब धीरज खोता हूँ,
कविता तब मुझको उत्तर बतलाती है।

जब भी विपदाओं की आँधी चलती है,
शंकाएँ बनकर चक्रवात बढ़ती हैं।
मैं विचलित हो जब ठौर नहीं पाता हूँ,
कविता तब बनकर ढाल उभर आती है।

जीवन रण में जब भी विभ्रम होता है,
जब मोह ग्रस्त हो, मन धीरज खोता है।
जब धनुष फेंक, मैं लक्ष्य-भ्रष्ट होता हूँ,
कविता मुझको बन 'गीता' समझाती है।

जब सोग, दुःख की छाया गहराती है,
मन की निर्बाध तरंगें, थम जाती हैं।
मैं हतप्रभ, हतविश्वास-सा जब होता हूँ,
कविता तब मन को रस से भर जाती है।

ले गोद में अपनी, व्यथित शीष को मेरे,
अपने हाथों से किञ्चित सहलाती है।
देती मुझको विश्वास अटल है, जय का,
मेरे कातर अंतर को बहलाती है।

है रक्षा करती शोक, दुःख से,भय से,
दे त्राण अलौकिक, मुझको वो जाती है।
जब काल-चक्र से विस्मृत मैं होता हूँ,
कविता तब मुझको जीना सिखलाती है।

- अंशुल।

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