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Tuesday, 24 July 2018

ग़ज़ल कहना नहीं आसान

ग़ज़ल कहना नहीं आसान प्यारे,
बड़ा मुश्किल है इम्तेहान प्यारे।

लगाओ दम, अगर है दम तो देखो,
निकल आएगी इसमें जान प्यारे।

भला यूँ दिल्लगी में इस तरह मत,
यहाँ ख़ुद को करो क़ुर्बान प्यारे।

ये है दरिया के जिसमें आग ही है,
ये खेल इतना नहीं आसान प्यारे।

यहाँ दुश्वारियाँ हैं हर कदम पर,
तुम्हें जिनकी नहीं पहचान प्यारे।

बस अपना हौसला हिम्मत न हारो,
यही हैं जीत के इमक़ा प्यारे।

ज़हन मासूमियत लबरेज़ रक्खो,
बुलंदी पर रखो ईमान प्यारे।

ग़ज़ल में जल्दबाज़ी ही मना है,
ज़रा सा रखो इत्मीनान प्यारे।

- अंशुल तिवारी।

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