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Tuesday, 27 October 2026

माँ

माँ कहीं नहीं जाती,
माँ सिर्फ़ दिखाई नहीं देती,
दरस्ल वो ढल जाती है,
घर कि चौखट में,
रम जाती है सिलबट्टे में,
घुल जाती है तीज त्यहारों,
की तैयारियों में,
बस जाती है नाती-पोतों के,
शोर-शराबे में,
रहती है बच्चों की,
तरक्की में छुपकर,
घर में बरक्कत की तरह,
फैल जाती है,
माँ उग आती है,
क्यारी में तुलसी बनकर,
माँ बच्चों से कहाँ,
अलग हो पाती है!!!

- अंशुल।






महायोगी

आँख धुंधली है,
भरे हैं अश्रु इनमें,
है भरा क्रंदन, रुदन,
हर कंठ में ही,
किन्तु इस भीषण रुदन,
के हिमगिरि के पार देखो,
घोर गर्जनमय, गहरते,
अश्रु सागर पार देखो,

किसी हिम की कंदरा में,
दिख रहे हैं मुझे तो वे,
मुस्कुराते, शांत, स्थिर, गंभीर,
ध्यानासन्न बैठे.....
कभी,
लेकर बांसुरी स्तुति गान गाते,
वंशिकाधर को मनाते....
कभी,
खोले ग्रन्थ पढ़ते, और 
समझाते हुए वेदांत, 
दैवी लोक में भी....

गौर से देखो,
यहाँ ये शयन रत जो दिख रहा है,
वस्त्र है केवल...जिसे अब त्यागकर,
हाँ उस तरफ़, निज कर्म करने,
बढ़ चला है 'कर्मयोगी',
बढ़ चला है 'महायोगी'...

- सादर 

अंशुल....

Friday, 24 April 2026

papa ke liye

 कभी आफ़ताब, कभी चाँदनी बनकर।
कभी चिराग़, कभी रोशनी बनकर।

या, कभी तपाकर अपने आप को भी,
आप कैसे भर देते हैं मेरी आँखों में उजाले।

हाँ, दृश्य जो मैं देखता हूँ,
उसके कारक आप ही हैं।

आप कैसे ये घनी धूप सहकर भी,
बाँटते हैं केवल शीतल छाँह।

शायद मैं इसे कभी समझ नहीं पाऊँगा,
किन्तु मेरे लिए इतना ही जानना काफ़ी है,

कि मैं, आपका ही विस्तार हूँ।

जन्मदिन की अनेक शुभकामनाएँ, पापा।
श्री हनुमान जी हमेशा कृपालु रहें.....#जाके गति है हनुमान की.....