मेरी ही तरह,
वो जो मेरा गाँव था ना,
जब छोटा था,
तब अबोध था,
नादान था,
लेन-देन की दुनियावी रिवायत से,
अनजान था।
बड़ा होकर कस्बा बन जाने के,
सपने सजाता था!
अपने गाँव होने पर,
ज़रा सकुचाता था।
पर मजबूर था...क्या करता??
ख़ैर मुझे क्या...!
मैं तो चल पड़ा था, शहर की तरफ़,
तक़दीर से लड़ने,
किस्मत बदलने!!
पर, आज जब अर्से बाद!!
मैं शहर की धूप से जलकर,
दुनियादारी से झुलसकर,
गाँव पहुँचा!!
तो देखा....
अब वो भी शहर बन गया था!!
उसका सपना था, सच हो गया था...
पर,
अब वो शाम ढले भी नहीं सोता है!
आँखों में कोयला भरे,
अकेले में रोता है।
किसी से कुछ नहीं कहता,
बस मुझे जताता है।
मेरी ही तरह, हर-साँस में,
पछताता है!!
-अंशुल तिवारी।
27.04.19
हरिद्वार।।