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Saturday, 27 April 2019

गाँव!!

मेरी ही तरह,

वो जो मेरा गाँव था ना,

जब छोटा था,

तब अबोध था,

नादान था,

लेन-देन की दुनियावी रिवायत से,

अनजान था।

बड़ा होकर कस्बा बन जाने के,

सपने सजाता था!

अपने गाँव होने पर,

ज़रा सकुचाता था।

पर मजबूर था...क्या करता??

ख़ैर मुझे क्या...!

मैं तो चल पड़ा था, शहर की तरफ़,

तक़दीर से लड़ने,

किस्मत बदलने!!

पर, आज जब अर्से बाद!!

मैं शहर की धूप से जलकर,

दुनियादारी से झुलसकर,

गाँव पहुँचा!!

तो देखा....

अब वो भी शहर बन गया था!!

उसका सपना था, सच हो गया था...

पर,

अब वो शाम ढले भी नहीं सोता है!

आँखों में कोयला भरे,

अकेले में रोता है।

किसी से कुछ नहीं कहता,

बस मुझे जताता है।

मेरी ही तरह, हर-साँस में,

पछताता है!!

-अंशुल तिवारी।

27.04.19

हरिद्वार।।

Friday, 26 April 2019

बदलाव!!

मेरा...
वो छोटा शहर,
वो ख़ुशबाश लोग,
ठंडक देती दीवारें,
हरी-भरी सड़कें,
शहर को जोड़ते पुल,
चूने की  छज्जेदार इमारतें,
पुराने छायादार दरख़्त,
वो हरियाले मैदान,
ज़रूरत को भरते बाज़ार,
पुराना यादगार टॉकीज़,
चाय-बिस्कुट की ठेलियाँ!!!

अब नए हो चुके,
इस शहर में कुछ भी नहीं बचा!

अब यहाँ बस ,
कंक्रीट ही कंक्रीट है,
सड़कों में,
दीवारों में,
इमारतों में,
बाज़ारों में,
शायद,
इंसानों में भी!!

-अंशुल तिवारी
26।04।19
हरिद्वार।।

Friday, 19 April 2019

अगला दृश्य!!

अगला दृश्य!!

हम सोचते कहाँ हैं?
कि आज जो है,
वो कल कैसा होगा!
क्या होगा??
हाँ सोचने की ज़रूरत भी,
किसे महसूस होती है?
बस दिल कहता है,
यूँही सब कुछ चलता रहे।
बिना बदले!
फिर एक दिन अचानक,
ज़िन्दगी...
बदलती है पटरियाँ।
किसी रेल की तरह,
हमें आज से दूर ले जाती है,
बहुत दूर।
ऐसी किसी जगह,
जहाँ कल की कोई परछाई,
तक नहीं होती।
जहाँ हम, तुम, मैं,
पूरी तरह बदल चुके होते हैं,
इस तरह जैसे रंग बदल लेता हो,
गिरगिट!!
और फिर खुलता है,
ज़िन्दगी के रंगमंच का पर्दा,
नाटक के अगले दृश्य का!!!

-अंशुल।