अगला दृश्य!!
हम सोचते कहाँ हैं?
कि आज जो है,
वो कल कैसा होगा!
क्या होगा??
हाँ सोचने की ज़रूरत भी,
किसे महसूस होती है?
बस दिल कहता है,
यूँही सब कुछ चलता रहे।
बिना बदले!
फिर एक दिन अचानक,
ज़िन्दगी...
बदलती है पटरियाँ।
किसी रेल की तरह,
हमें आज से दूर ले जाती है,
बहुत दूर।
ऐसी किसी जगह,
जहाँ कल की कोई परछाई,
तक नहीं होती।
जहाँ हम, तुम, मैं,
पूरी तरह बदल चुके होते हैं,
इस तरह जैसे रंग बदल लेता हो,
गिरगिट!!
और फिर खुलता है,
ज़िन्दगी के रंगमंच का पर्दा,
नाटक के अगले दृश्य का!!!
-अंशुल।
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