मेरा...
वो छोटा शहर,
वो ख़ुशबाश लोग,
ठंडक देती दीवारें,
हरी-भरी सड़कें,
शहर को जोड़ते पुल,
चूने की छज्जेदार इमारतें,
पुराने छायादार दरख़्त,
वो हरियाले मैदान,
ज़रूरत को भरते बाज़ार,
पुराना यादगार टॉकीज़,
चाय-बिस्कुट की ठेलियाँ!!!
अब नए हो चुके,
इस शहर में कुछ भी नहीं बचा!
अब यहाँ बस ,
कंक्रीट ही कंक्रीट है,
सड़कों में,
दीवारों में,
इमारतों में,
बाज़ारों में,
शायद,
इंसानों में भी!!
-अंशुल तिवारी
26।04।19
हरिद्वार।।
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