हे अथाह! निःसीम,
जगत के ओर-छोर तक,
फैले सागर,
ओ!! अगाध तुम...
आज बोल दो!!
भेद खोल दो!
मुझे बताओ..…
तुम किस कारण,
क्षण-क्षण में इतने भीषण,
रौरव स्वर में,
क्रंदन करते हो??
क्यूँ इस तरह हुए व्याकुल,
इन चट्टानों पर भाल,
पटकते बस रहते हो??
तुम तो रत्नाकर,
महासिंधु हो!
तुम्हें कमी है कौन बताओ??
पास तुम्हारे संचित कितने रत्नकोश हैं!!
मुक्तामणियों के अगणित आगार,
तुम्हारे चरणों में बेकार पड़े हैं।
ओ ! दुर्लभ तथा अलभ्य वस्तुओं, के रखवाले,
तुम क्यों इतनी बेचैनी से,
यूँ तट तक आकर,
बिन बोले कुछ लौट रहे हो??
मैं बड़ी दूर से आया हूँ,
यों देख तुम्हें, भरमाया हूँ!
ये सोचा नहीं कभी मैंने,
यूँ सब कुछ पाकर भी कोई,
क्या इतना व्याकुल होता है!
क्रंदन करता है ,रोता है??
मैं हतप्रभ होकर,
देख रहा हूँ!
सोच रहा हूँ!
दो पल पास तुम्हारे बैठूँ और सुनूँ तुमसे,
क़िस्सा इस परम वेदना का,
व्याकुलता का, अधीरता का।
पर, मैं तो अभी स्वयं की,
व्याकुलता में डूबा,
भावों के झंझा में उलझा,
भटक रहा हूँ।
विवश भागता फिरता हूँ,
दुर्लभ रत्नों की ही तलाश में!!
मैं फिर आऊँगा पास तुम्हारे,
सुख-दुख सभी सुनूँगा सारे!
तुम धैर्य युक्त हो,
तब तक निज को रोके रखना,
रस्ता तकना!!
-अंशुल तिवारी।