शौक कहता है न सोचूँ ,
बस कहा जो,
कर दिखाऊँ!
और सोचा जो उसे,
हासिल करूँ!
मैं जीत जाऊँ।
ख़्वाब जो भी और जैसा भी,
हुआ,
उसको हक़ीक़त में,
बदलकर,
झोंक कर ख़ुद को इसी,
उत्तेजना में,
स्वप्न गागर, भर सकूँ,
मैं रीत जाऊँ!
पर अगर ऐसा हुआ भी,
घर जला कर,
रौशनी पाई चिराग़ों ने मेरे,
तो क्या हुआ फिर??
आँख ही जब न रहेगी,
कौन देखेगा,
सुहाने ख़्वाब को सच में बदलते।
तो कहो ये दौड़ फिर किसके लिए है?
जान की बाज़ी लगाए,
कोशिशें मुमकिन सभी किसके लिए हैं?
ज़िन्दगी,
क्या ये लड़ाई है जिसे बस जीतना है?
या, के बस,
हर शौक पूरा कर मुझे यूँ रीतना है?
शौक, सपने, ख़्वाब, चाहत, आरज़ू के,
दरम्याँ मैं हूँ खड़ा,
ये सोचता हूँ!
क्या करूँ मैं, क्या बताऊँ???
-अंशुल तिवारी।
15.05.19
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