ग़ज़ल...गुज़ारिश।।
तुम अपने दिल के चराग़ों को तेल तर रक्खो,
भला न सिर्फ़ हवाओं पे ही नज़र रक्खो।
बड़ी हैं मुश्किलें, दुश्वारियाँ भी बेहद हैं,
कठिन है हौसला रखना यहाँ, मग़र रक्खो।
ये है बाज़ार यहाँ, बोलियाँ भी ऊँची हैं,
यहाँ ईमान को अपने टटोलकर रक्खो।
तुम्हें दुनिया सिखा रही है ते उसूल नया,
जो शय है आख़िरी ,उसको ही पेश-तर रक्खो।
बदल गई है रवायत यहाँ पे जीने की,
ज़ुबाँ पे फूल रखो, जिगर में नश्तर रक्खो।
- अंशुल तिवारी।
हरिद्वार
04-05-19
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