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Wednesday, 10 November 2021

बचपन

मेरा बचपन मुझे अक्सर, यूँ रह-रहकर सताता है!
पुराने सब वही किस्से, ये अक्सर ही सुनाता है!
कभी लुका-छिपी का खेल, कभी वो दौड़ बेफ़िक्री,
कभी वो आम की चोरी,  मिठाई मीठी वो गुड़ की!
कभी वो नाव काग़ज़ की, कभी तालाब में डुबकी,
कभी वो स्कूल से छुट्टी, किसी भी बात पर कट्टी!
वो क्या यारों की थी टोली, वो शैतानों की थी टोली,
उधम जी भर मचाना वो, थी बदमाशियाँ भोली।
मेरे बचपन में हर मौसम बहुत ही ख़ूबसूरत था,
मुझे बचपन मेरा अक्सर बहुत ही याद आता है,
मेरा बचपन मुझे अक्सर, यूँ रह-रहकर सताता है!

-अंशुल तिवारी

Sunday, 7 November 2021

इन पहाड़ों में (reels)

Reel
पता है...कभी-कभी दिल करता है कि इस बड़े शहर को छोड़कर कुछ दिन पहाड़ों में ही गुज़ारूँ,
क्यूंकि शहर की हवा में oxygen तो बहुत ज़्यादा है, पर ज़िंदगी बहुत कम....
और इन पहाड़ों में, oxygen भले ही कुछ कम हो, लेकिन ज़िंदगी बहुत ज़्यादा है!!! 

Wednesday, 27 October 2021

मेरी फ़िक्र क्यूँ करते हो?

ये उनको लग रहा होगा!
मेरा होगा क्या? क्या होगा?
जो चिंतामग्न हैं,मेरे लिए,
ये सोचकर शायद, मैं हूँ किस काम का आख़िर!
तो, मैं उनसे ये कहता हूँ,
अजी! इस बात में भी क्या भला,
रक्खा है? क्या रक्खा?
न ख़ुद को कष्ट दो,
मुझको, मेरे ही हाल पर छोड़ो,
भले ही राख से हूँ जो ढँका,
ठंडा नहीं समझो,
अगर इतराओगे, मुझको उठाकर,
खेल समझोगे, ज़रा-सी बस हवा छूकर,
मैं चमकूंगा सितारे-सा, तुम्हारे हाथ,
जल जाएँगे, आँखें चुँधिया जाएँगी,
मेरी रौनक, चमक और तेज से,
सुलगोगे, दहकोगे...
इसी को जानकर मैं कह रहा,
तुमको है क्या करना ??
तुम अपने दिल, दिमाग़ में,
बस यही एक बात बैठा लो,
तुम्हारी झूठ से लबरेज़,
फ़िकर जो है दिखावे की,
इसे अपने ही तक रक्खो,
रहो तुम भी, मुझे भी और सुकूँ से, 
यार रहने दो..
न सोचो मेरे बारे में, न सोचो मेरे बारे में!
-अंशुल।

Saturday, 23 October 2021

किसलिए लिखोगे तुम???

सवाल ये अजीब है, कि किसलिए लिखोगे तुम?
अगर किसी ने बस कहा है, यार कुछ सुनाओ तो!
तो दूसरों की थाप पर पिटोगे बनके ढोल ही!!
रहोगे भेड़ की तरह कि जिस तरफ़ कहा,
वहीं को चल पड़े या रुक गए!
अगर है ये वजह के मेरे पास कुछ भी है नहीं,
यहाँ जो और हैं खड़े हैं शोहरतों के ढेर पर,
बड़ी इमारतों में उनके नाम हैं गुदे हुए!
जिन्हें है जानता शहर का बच्चा-बच्चा, हर बशर,
तो क्यूँ न उनके बीच मैं भी, नाम कुछ कमा ही लूँ!!
और इसलिए ही लेखनी को साफ़ कर चला ही लूँ!!
तो उनके बीच झोलियाँ उठाए से दिखोगे तुम!
बिना ही भिक्षापात्र एक भिक्षुक लगोगे तुम!
जो स्वाभिमान को जला के पेट भर रहा है बस,
दया पे दूसरों की जी रहा है और मर रहा!
अगर चले कहे पे दूसरों के ख़ुद को हारकर,
अगर बिके जो शोहरतों के दाम यूँ दुकान पर,
तो तुम कहाँ रहोगे फिर, जो आज तुम हो इस घड़ी,
जिएगा तुम में, रेंगता-सा शोहरतों का कीट ही!
इसीलिए ही कह रहा, जवाब पहले सोच लो!
सवाल ये अजीब है! कि किसलिए लिखोगे तुम!!

-अंशुल।
(23.10.21)
हरिद्वार

Thursday, 21 October 2021

वो लिखो जो बिक सके

बाज़ार की ये मांग है, तुम वो लिखो जो बिक सके,
जो बिका नहीं बाज़ार में, बेकार है! बेकार है!
तुम जो भी लिखते हो यहाँ, उसे अपने हाल पे छोड़ दो।
बाहर चलो, बाज़ार में, देखो दुकानों में सभी,
क्या-क्या सजा है, तैयार है, बिक जाने को बेकरार।
तुम भी लगाओ बोलियाँ, बाज़ार का अंदाज़ लो।
अब मोल-भाव को देखकर, अपने लिखे का स्मरण करो।
सोचो इसी बाज़ार इक दुकान हो जो तुम्हारी भी,
तुम भी खड़े हो धूप में, कितना बिकोगे अब कहो?
बेचोगे कैसे लिखा हुआ? क्या फ़ायदे बतलाओगे?
तुमने लिखा जो भी यहाँ, उसमें हैं बस कड़वाहटें!
दुनिया की असली शक्ल है, पर ये किसे रास आएगी!!
लोगों को तो भाती है बस, शब्दों की मीठी चाशनी,
या चट-पटी बातें, मसालेदार-सी छींटा-कशी!
ये सब तुम्हारे कहन में तो है नहीं , बिल्कुल नहीं!
फिर कौन पैसे ख़र्च कर, ए यार! तुमको ख़रीदेगा,
तुम अपने घर वापस चलो, फिर से अकेले बैठकर,  
इस हाल पर भी कुछ लिखो, तुम अपने सच को ही लिखो!
अब कोशिशें भी मत करो, कि वो लिखो जो बिक सके!!

-अंशुल।
22.01.21
(हरिद्वार)

Thursday, 17 June 2021

पथभ्रष्ट

सुनी सुनाई, जो बात सुनकर,
बड़े ये आलिम बने हुए हैं!
ये जानते हैं तो क्या जानते हैं?
ये बस चुराकर कहीं से कुछ भी,
या सुन-सुनाकर कहीं से कुछ भी,
ज़माने में पीटते ढिंढोरा,
बिना ज़मीं के खड़े हुए हैं!
न इनके पैरों के नीचे कुछ है,
न इनके होश-ओ-हवास कायम!
ये झूठ को मानकर सच यहाँ पर,
उठाए परचम भटक रहे हैं,
कहाँ पे जाना ये चाहते हैं?
कहाँ पहुँचकर ये दम भरेंगे!
-अंशुल।

Tuesday, 23 March 2021

फाग गीत

उड़े-उड़े अवध में रंग, राम जी रंग खेलें!
उड़े-उड़े अवध में रंग, राम जी रंग खेलें!
सिया, लखन, संग हनुमंत, राम जी रंग खेलें!

सोने की है पिचकारी, जी बन्यो फूल को रंग,
लाल, गुलाबी, नीला, पीला, सबै देख हैं दंग!
नाचें लोग निहाल भए, घर-घर में है आनंद!
सब भूले, सुध-बुध, ढंग! राम जी रंग खेलें!

अवध पुरी लौट रघुनंदन, बरसों बाद बधाई!
पहली होली घर में खेलें राजा राम, बधाई!
पुनः हुई सुख वर्षा देखो, घर-घर खुशियाँ छाईं!
सब बाँटो आज मिठाई! राम जी रंग खेलें!

जन के राजा, सिंहासन पर, देखो पुनः बिराजे,
सभी ओर श्री रामचन्द्र के गूँजे गाजे-बाजे!
सोभा देख अवधपुर की, देवता स्वर्ग में लाजे!
सिय, लखन, पवनसुत साजे! राम जी रंग खेलें!

अबकी होली ऐसी होगी सोचा नहीं कभी था,
रघुवर के संग देखो आनंद दुगना हुआ सभी का,
राजमुकुट पहने सियवल्लभ, सिर अबीर का टीका,
हर रस लागे अब फीका, राम जी रंग खेलें!

उड़े-उड़े अवध में रंग, राम जी रंग खेलें!
सिया, लखन, संग हनुमंत, राम जी रंग खेलें!

-अंशुल तिवारी।