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Wednesday, 10 November 2021

बचपन

मेरा बचपन मुझे अक्सर, यूँ रह-रहकर सताता है!
पुराने सब वही किस्से, ये अक्सर ही सुनाता है!
कभी लुका-छिपी का खेल, कभी वो दौड़ बेफ़िक्री,
कभी वो आम की चोरी,  मिठाई मीठी वो गुड़ की!
कभी वो नाव काग़ज़ की, कभी तालाब में डुबकी,
कभी वो स्कूल से छुट्टी, किसी भी बात पर कट्टी!
वो क्या यारों की थी टोली, वो शैतानों की थी टोली,
उधम जी भर मचाना वो, थी बदमाशियाँ भोली।
मेरे बचपन में हर मौसम बहुत ही ख़ूबसूरत था,
मुझे बचपन मेरा अक्सर बहुत ही याद आता है,
मेरा बचपन मुझे अक्सर, यूँ रह-रहकर सताता है!

-अंशुल तिवारी

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