ख़ुद के अंदर...वो लड़का,
जो लड़ सकता था,
अपने सपनों के लिए,
दुनिया के हर एक शख़्स से!!!
वो जो आवाज़ उठा सकता था,
होते हुए अन्याय को देखकर!!
वो जो सबके बीच,
चमकता हीरे-सा!
या बुद्धिमानों की सभा में
उद्दीप्त होता, सूर्य की तरह!!
और, वो जो मुहब्बत में,
जान की बाज़ी लगा देता!
.......
मैं अब तक उस लड़के को,
अपने अंदर ढूंढ रहा हूं!!
जो शायद दबा हुआ है,
ज़रूरतों के दलदल में!...
दुनियावी रिवाजों के,
कोयले के नीचे...
नीति-नियम, तथाकथित,
सभ्यता के पत्थरों से!
मैं ढूंढ रहा हूं...
इसी उम्मीद में,
कि, किसी दिन वो मिलेगा,
मेरे भीतर सर उठाएगा!
उंगलियां चटकाएगा,
बाहर निकलेगा,
कुछ कर दिखाएगा!...
बस तब तक मुझे ख़ुद को,
बचाना है,
प्रौढ़ हो जाने से!!
-अंशुल।
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