माँ सिर्फ़ दिखाई नहीं देती,
दरस्ल वो ढल जाती है,
घर कि चौखट में,
रम जाती है सिलबट्टे में,
घुल जाती है तीज त्यहारों,
की तैयारियों में,
बस जाती है नाती-पोतों के,
शोर-शराबे में,
रहती है बच्चों की,
तरक्की में छुपकर,
घर में बरक्कत की तरह,
फैल जाती है,
माँ उग आती है,
क्यारी में तुलसी बनकर,
माँ बच्चों से कहाँ,
अलग हो पाती है!!!
- अंशुल।
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