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Sunday, 27 May 2018

श्री हनुमतवंदनाष्टक

।।हनुमंत वंदना।। (अष्टक)
1.
केसरी किसोर, जाके बल को न ठौर कोई,
ऐसो रखवार तज और कहाँ जाईए।।
अशरण शरण औ' करुणा निधान राम,
दास के चरण में ही मन को लगाईए।।
लोक को सँवार, परलोक भी बनाए देत,
साहिब सुजान हनुमान को मनाईए।।
नीति-रीति, विधि के विधान में न उलझिये,
छल-बल त्याग बस राम राम गाइये।।

2.
जाको सुमिरन दुःख दुसह दरिद्र हरै,
नाम लेत संकट सकल मरि जात हैं।।
जिनकी हुँकार से, त्रिलोक होत कंपित व,
नीच असुरों के दुष्ट दल भय खात हैं।।
राम का आसीस जाके सीस नित सोहत है,
सम्भव, असम्भव को क्षण में बनात हैं।।
साधुजन रच्छक हैं, दुष्ट गण भच्छक हैं,
राम को गुलाम, "महावीर जी" कहात हैं।।

3.
खेल-खेल माँहिं छाती, गगन की चीर कर,
हाहाकार अंतरिक्ष, जाय के मचाए हैं।।
भूख लगने पे दिनकर को समझ फल,
जगत प्रकाशक को मुख में छिपाए हैं।।
वेद जाको जयगान, गावत हैं नेति-नेति,
देव नत-शीष जाकी शरण में आए हैं।।
अंजनी के लाल जाकी, महिमा बिसाल अति,
भक्त हितकारी सब, जग में कहाए हैं।।

4.
तेज अनुपम गुण, जिनके अलौकिक हैं,
शारद व शेष पार जिनका न पाए हैं।।
हार गए ढूँढ-ढूँढ, थक गए लिख-लिख,
जेते ज्ञानवान इस, जग में कहाए हैं।।
चौदह भुवन, नभ, धरती, पताल सब,
देख-देख, छान-छान, हाय पछताए हैं।।
बुधि-बल, ज्ञान में समान, हनुमान जी के,
दूसरा न कोई यह, दृग देख पाए हैं।।

5.
एकही छलांग में जी लांघि महासागर को,
शत-योजनों को गऊ-पद सा बनाए हैं।।
जिनका प्रचंड वेग और अतिबल देख,
जल, थल, नभचर सब घबराए हैं।।
रामकाज साधने में, देर न लगाए राम-,
-बाण सम वेग धारि, हनुमत धाए हैं।।
जेते वेगवान सब, जानत जहान आज,
काल, मन, पवन, सकल ही लजाए हैं।।

6.
रामजी को दूत बन, मसक सों रूप धर,
रामजी की जय बोल कपि जी सिधारे हैं।।
द्वार पे ही लंक के जो, लंकिनी ने रोक लिया,
मुठिका प्रबल हनुमान, तब मारे हैं।।
सीय सुधि ज्ञात कर, अवसर साधकर,
मारि-मारि, फेंक-फेंक, असुर संघारे हैं।।
तिनको के ढेर सम, स्वर्ण पुर फूँक दियो,
कूद-कूद इत-उत, लंका सब जारे हैं।।

7.
ऐसो अतुलित बल, आपने दिखायो फिर,
लौट रघुनाथ जी के, चरणों में आए हैं।।
बीर बिकरम ज्ञान, गुण में प्रथम आप,
रामजी को दास कहलात सुख पाए हैं।।
परम् विनीत गुणवान हनुमान जैसा,
योधा तिहुँ लोक में न, और कोई पाए हैं।।
युद्ध में प्रबुद्ध, सन्त परम् विशुद्ध, हिय,
प्रेम की अनोखी गंगधार को समाए हैं।।

8.
आशुतोष शंकर को, अंश हनुमान राम,
काज साधने के हित लीन्ह अवतार हो।।
अंजनी के लाल महाकाल दुष्टजन हेतु,
निज जन हेतु प्रेम सागर अपार हो।।
दास कहे जोरि पाणि, संकट सहाय होवो,
नाव फँसी नाथ मेरी, बीच मझधार हो।।
और का भरोस मोहे कछु नहिं नाथ मेरे,
रखवार आप बस, अंजनीकुमार हो।।

।।श्री हनुमतवंदनाष्टक सम्पूर्ण।।
।।श्री रामार्पणमस्तु।।
।।जै जै सिया राम, जै जै हनुमान।।

-अंशुल।।

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