"दुनिया सारी ये ख़्वाब है!"
वाइज़ ने कल कुछ यूँ कहा,
दुनिया ही सारी ख़्वाब है!
ये ख़्वाब ही है अगर कहो,
तो किसलिए लड़ते हो तुम?
जीते तो भी क्या पाओगे?
गर दुनिया सारी ये ख़्वाब है!!!
तुमने कहा तो ये भी था,
ये हर घड़ी है मिट रही,
ये एक दिन खो जाएगी,
तो जो ख़ुद-ब-ख़ुद मिट जाएगी,
उसे अपनी तरह बनाने की,
इन कोशिशों में लगे हो क्यूँ?
गर दुनिया सारी ये ख़्वाब है!!!
तुम कह रहे थे ये भी तो,
ये जो दौलतों के ढेर हैं,
ये जो शोहरतों के मक़ाम हैं,
मिट्टी हैं सब, मिट्टी हैं सब!
तो ये अपनी जेब में धूल ही,
लेकर ग़ुरूर में गुम हो क्यूँ?
तुम पहले अपनी बात पर,
अपना यकीं कायम करो,
न के सिर्फ़ तख़्त पे बैठ कर,
झूठे दिलासे दिया करो।
जो बात मेरी चुभे अगर,
तो ग़मज़दा होना नहीं,
के दुनिया सारी ही ख़्वाब है!
और ख़्वाब का क्या वजूद है!
-अंशुल।