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Monday, 14 December 2020

दुनिया सारी ये ख़्वाब है!

"दुनिया सारी ये ख़्वाब है!"

वाइज़ ने कल कुछ यूँ कहा, 
दुनिया ही सारी ख़्वाब है!
ये ख़्वाब ही है अगर कहो,
तो किसलिए लड़ते हो तुम?
जीते तो भी क्या पाओगे?
गर दुनिया सारी ये ख़्वाब है!!!
तुमने कहा तो ये भी था,
ये हर घड़ी है मिट रही,
ये एक दिन खो जाएगी,
तो जो ख़ुद-ब-ख़ुद मिट जाएगी,
उसे अपनी तरह बनाने की,
इन कोशिशों में लगे हो क्यूँ?
गर दुनिया सारी ये ख़्वाब है!!!
तुम कह रहे थे ये भी तो,
ये जो दौलतों के ढेर हैं,
ये जो शोहरतों के मक़ाम हैं,
मिट्टी हैं सब, मिट्टी हैं सब!
तो ये अपनी जेब में धूल ही,
लेकर ग़ुरूर में गुम हो क्यूँ?
तुम पहले अपनी बात पर,
अपना यकीं कायम करो,
न के सिर्फ़ तख़्त पे बैठ कर,
झूठे दिलासे दिया करो।
जो बात मेरी चुभे अगर,
तो ग़मज़दा होना नहीं,
के दुनिया सारी ही ख़्वाब है!
और ख़्वाब का क्या वजूद है!

-अंशुल।

Wednesday, 2 December 2020

ये लिखने वालों की भीड़ है!

ये लिखने वालों की भीड़ है,
ये लिखने वालों की भीड़ है!
ये सिर्फ़ हाथ में ले कलम,
लिखने की होड़ में है लगी,
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
ये है खो चुकी अपनी समझ,
ये वमन ही करना है जानती,
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
इस भीड़ की है शकल नहीं,
गुमनाम इसके निशान हैं!
इसे सिर्फ़ ख़ुद से ही प्यार है,
अपने ही ऊपर निसार है,
ये न पढ़ना, सुनना ही जानती,
बस लिखना, लिखना ही चाहती!
जो भी लिखे, जैसा लिखे,
बस 'दाद' उसपे है मांगती।
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
यही मंच पर आसीन है,
श्रोताओं में यही शुमार भी!
जो सुन रहा, जो सुना रहा,
सब इसी भीड़ का भाग हैं!
तुम मेरे छंद पे दाद दो,
बदले में मेरी वाह लो!
सौदा बड़ा सीधा सरल,
करके तो देखो इक दफ़ा।
जो कवि न तुमको बना ही दें,
तो ये नाम अपना बदल दें हम।
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
इसे सिर्फ़ नाम ही चाहिए,
इसे वाह-वाही है पसंद,
ये है झूठ में खोई हुई,
ये जो लिखने वालों की भीड़ है!

-अंशुल।

Tuesday, 1 December 2020

जो लिखी नहीं गई!

वो एक कविता...
जो लिखी ही नहीं गई अब तक,
जो चलती रहती है ज़हन में,
साथ-साथ हर पल!
इस तमन्ना में, कि कभी तो काग़ज़ पे उतरेगी,
ठीक वैसे ही!
जैसे उतरी थीं कभी,
ब्रह्मकमण्डल से प्रवाहमयी गंगा,
गंगा जब उतरी थीं,
तो दबाती चली गईं थी पृथ्वी को,
रसातल में अपने वेग से!
तब इस कष्ट से
मुक्ति देने, बीच में आ गए थे,
गंगाधर शंकर!
फैलाए अपनी जटाएँ, चतुर्दिक!
बाँध चुके थे गंगा को,
धार चुके थे उसके वेग को,
धरती बच गई थी, उस वक्त!
और यहाँ,
मेरे पास भी कुछ है,
जो उतरा नहीं है काग़ज़ पर,
ये भी हिला सकता है पृथ्वी को,
कम्पित कर सकता है
दिक्पालों को, धँसा सकता है ज़मीन को रसातल में,
यहाँ भगीरथ भी मैं हूँ,
और शंकर भी!
प्रयासरत हूँ कि कभी तो उतरे,
विचाराकाश से वो गंगा/कविता,
जो लिखी ही नहीं गई,
आज तक।

-अंशुल।

Friday, 27 November 2020

वो क्या कोई कवित्त है?

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो चित्त को जला-जला के राख-राख कर गया,
जो चैन, शांति, प्रेम, धैर्य, औ' सौहार्द हर गया!
जो जन्मते ही दम्भ के गहन तिमिर में खो गया,
जो बोध के नयन को मूंद कुरूपति-सा हो गया!
जो अपने लाभ के लिए सभी नियम भुला गया,
जो नीति, तथ्य और विवेक को समूल खा गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो मानवों को मानवों का शत्रु ही बना गया,
जो मोहरों की भाँति उनको साथ में लड़ा गया!
जो अग्नि वैमनस्य की समाज में जला गया,
के जिसके हाथ से हरेक आदमी छला गया!
जो शांति की सुधा छुड़ा के वैर विष पिला गया,
जो सत्य, स्नेह, मित्रता की नींव को हिला गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो मुझमें अहंकार को जगा गया, जगा गया,
हूँ सर्वश्रेष्ठ मैं ये मेरे कान में बता गया!
जो मुझको बोध पथ से सर्वथा ही दूर कर गया,
के जिसके जन्मने से मन में द्वेष भाव भर गया।
जो मुझको आत्मवन्दना की होड़ में लगा गया,
जो ज्ञान मूल को उखाड़ धूल में मिला गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?

कवित्त वो जो है, जो भरे मनुज के मन को धीर से,
जो आत्म को करे सुपुष्ट, ज्ञान गंग नीर से।
जो चित्त में भरे सदा ही शांति, अनुराग को,
जगाए जो स्वतः ही शुद्ध त्याग को, विराग को।

कवित्त क्या जो माँगता हो जग से भीख मान की,
किसी से वाह-वाह की, किसी से निज प्रमाण की।

-अंशुल।

Wednesday, 25 November 2020

उन्मुक्त स्वर।

न मुझको दान चाहिए, न मुझको त्राण चाहिए,
न मैं के वो जो झोलियों में डालकर के पंक्तियाँ,
फिरूँ यहाँ गली-गली, के सिर्फ़ एक दाद पर,
लुटा दूँ अपने आप को, बिछा दूँ अपने आप को!
न मुझको दाद चाहिए, न मुझको वाह चाहिए,
के तुम जो अपने आप से भी झूठ ही हो बोलते,
न आईने में देखते, न ख़ुद को ही हो तोलते!!
तुम्हें वही पसंद है, जो है तुम्हारे काम का,
तुम्हें तो झूठ भावते, हो सच से तुम तो भागते,
तुम्हें तो तृप्तिकर है लगती बस तुम्हारी वन्दना,
अगर कहे कोई के तुमने की है जो भी वंचना!
तो शत्रु मानकर उसे न झेल पाओगे कभी,

मैं क्यूँ तुम्हारे सामने पड़ा रहूँ, खड़ा रहूँ,
हो कौन तुम, क्या जानते हो??
क्यूँ तुम्हारी इक फ़िज़ूल दाद पे मैं मर मिटूँ!
नहीं ये मेरे योग्य है...
मुझे न दाद चाहिए, मुझे न वाह चाहिए...
मैं मुक्त स्वर, मैं हूँ गगन, मैं भेद से रहित पवन,
मैं छंद में स्वच्छन्द, लेखनी का आत्मब्रह्म हूँ,
मैं बंजरों में गीत की नदी को मोड़ लाऊँगा,
मैं पत्थरों को फूल की कली से तोड़ जाऊँगा।
मैं क्षण में सृष्टि का सृजन, मैं क्षण में हूँ महाप्रलय,
मैं कल्प के भी पार हूँ, कभी हूँ एक पल में लय।
मुझे ज़रा बताओ गर जो तुम में कोई बात है,
तुम्हारी क्या बिसात है, तुम्हारी क्या बिसात है?

-अंशुल।