ये लिखने वालों की भीड़ है,
ये लिखने वालों की भीड़ है!
ये सिर्फ़ हाथ में ले कलम,
लिखने की होड़ में है लगी,
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
ये है खो चुकी अपनी समझ,
ये वमन ही करना है जानती,
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
इस भीड़ की है शकल नहीं,
गुमनाम इसके निशान हैं!
इसे सिर्फ़ ख़ुद से ही प्यार है,
अपने ही ऊपर निसार है,
ये न पढ़ना, सुनना ही जानती,
बस लिखना, लिखना ही चाहती!
जो भी लिखे, जैसा लिखे,
बस 'दाद' उसपे है मांगती।
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
यही मंच पर आसीन है,
श्रोताओं में यही शुमार भी!
जो सुन रहा, जो सुना रहा,
सब इसी भीड़ का भाग हैं!
तुम मेरे छंद पे दाद दो,
बदले में मेरी वाह लो!
सौदा बड़ा सीधा सरल,
करके तो देखो इक दफ़ा।
जो कवि न तुमको बना ही दें,
तो ये नाम अपना बदल दें हम।
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
इसे सिर्फ़ नाम ही चाहिए,
इसे वाह-वाही है पसंद,
ये है झूठ में खोई हुई,
ये जो लिखने वालों की भीड़ है!
-अंशुल।
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