वो एक कविता...
जो लिखी ही नहीं गई अब तक,
जो चलती रहती है ज़हन में,
साथ-साथ हर पल!
इस तमन्ना में, कि कभी तो काग़ज़ पे उतरेगी,
ठीक वैसे ही!
जैसे उतरी थीं कभी,
ब्रह्मकमण्डल से प्रवाहमयी गंगा,
गंगा जब उतरी थीं,
तो दबाती चली गईं थी पृथ्वी को,
रसातल में अपने वेग से!
तब इस कष्ट से
मुक्ति देने, बीच में आ गए थे,
गंगाधर शंकर!
फैलाए अपनी जटाएँ, चतुर्दिक!
बाँध चुके थे गंगा को,
धार चुके थे उसके वेग को,
धरती बच गई थी, उस वक्त!
और यहाँ,
मेरे पास भी कुछ है,
जो उतरा नहीं है काग़ज़ पर,
ये भी हिला सकता है पृथ्वी को,
कम्पित कर सकता है
दिक्पालों को, धँसा सकता है ज़मीन को रसातल में,
यहाँ भगीरथ भी मैं हूँ,
और शंकर भी!
प्रयासरत हूँ कि कभी तो उतरे,
विचाराकाश से वो गंगा/कविता,
जो लिखी ही नहीं गई,
आज तक।
-अंशुल।
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