सवाल ये अजीब है, कि किसलिए लिखोगे तुम?
अगर किसी ने बस कहा है, यार कुछ सुनाओ तो!
तो दूसरों की थाप पर पिटोगे बनके ढोल ही!!
रहोगे भेड़ की तरह कि जिस तरफ़ कहा,
वहीं को चल पड़े या रुक गए!
अगर है ये वजह के मेरे पास कुछ भी है नहीं,
यहाँ जो और हैं खड़े हैं शोहरतों के ढेर पर,
बड़ी इमारतों में उनके नाम हैं गुदे हुए!
जिन्हें है जानता शहर का बच्चा-बच्चा, हर बशर,
तो क्यूँ न उनके बीच मैं भी, नाम कुछ कमा ही लूँ!!
और इसलिए ही लेखनी को साफ़ कर चला ही लूँ!!
तो उनके बीच झोलियाँ उठाए से दिखोगे तुम!
बिना ही भिक्षापात्र एक भिक्षुक लगोगे तुम!
जो स्वाभिमान को जला के पेट भर रहा है बस,
दया पे दूसरों की जी रहा है और मर रहा!
अगर चले कहे पे दूसरों के ख़ुद को हारकर,
अगर बिके जो शोहरतों के दाम यूँ दुकान पर,
तो तुम कहाँ रहोगे फिर, जो आज तुम हो इस घड़ी,
जिएगा तुम में, रेंगता-सा शोहरतों का कीट ही!
इसीलिए ही कह रहा, जवाब पहले सोच लो!
सवाल ये अजीब है! कि किसलिए लिखोगे तुम!!
-अंशुल।
(23.10.21)
हरिद्वार
बढ़िया कविता।
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