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Thursday, 8 November 2018

श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 03

।।1।।
निज भक्त हित भगवान क्या हैं आज करते जा रहे,
ले हाथ ख़ुद ही भक्त हैं सुपथ पर ले जा रहे।
हरि जानते हैं हर मनुज में है छिपा अर्जुन कहीं,
जो व्यथित होकर मोह से यूँ त्याग न दे रण कहीं।

।।2।।
इस हेतु ही हरि ने रचा ये परम् गूढ़ विधान है,
कर लक्ष्य अर्जुन को दिया, इस विश्व को यह ज्ञान है।
नर के हृदय के शूल का जो, दिव्य एक निदान है,
नर जाति जिस से पाएगी, भविकाल में उत्थान है।

।।3।।
हम आइए अब देखते हैं, क्या हुआ आगे भला?
सुनकर विनय पृथुूपुत्र  की गोविंद ने फिर क्या कहा?
अब क्या नाइ चिंता धनंजय के हृदय में आ गई?
जो ज्ञान रवि ओर बादलों की भाँति आकर छा गई।

अर्जुन उवाच:
।।4।।
केशव कहा जो आपने मैं सोचता हूँ जब उसे,
भ्रम का बड़ा यह जाल आकर निकट ग्रसता है मुझे।
है ज्ञान उत्तम कर्म से यह आपने ही है कहा,
फिर क्यूं भयंकर कर्म में मुझको फँसाते हैं भला।

।।5।।
करुणानिधे क्यूँ नाश का पथ आप हैं दिखला रहे,
क्यूँ युद्ध करने की कला, मुझको यहाँ सिखला रहे।
संबंधियों के रक्त से, कैसे धरा को पाट दूँ,
कुल अग्रजों का शीष उन्नत, किस तरह मैं काट दूँ।

।।6।।
ये कर्म कुत्सित है, मलिन है, ये भयंकर पाप है,
मुझसे अधिक इस बात को, ख़ुद जानते हरि आप हैं।
मैं ज्ञान के पथ पर चलूँ, या कर्म को सर पर धरूँ,
इस द्वंद्व में मैं फंस गया, केशव कहो अब क्या करूँ?

।।7।।
भ्रमजाल मेरा काटिए, तम की घटाएँ छाँटिए,
दृढ़ निश्चयी हो जाऊं मैं, कुछ ज्ञान ऐसा बाँटिये।
इस द्वन्द्व से मुझको बचाकर शरण में लेलो प्रभो,
कल्याण जिस से हो मेरा, वह भेद भी मुझसे कहा।

श्री भगवानुवाच:
।।8।।
अर्जुन समझ इस बात को, जो आज कहता हूँ तुझे,
सन्देह के भ्रमजाल से मैं मुक्त करता हूँ तुझे।
अब तक कहा मैन तुझे इस लोक के अचार को,
निष्ठा मनुज के लोक की, इसके सकल विस्तार को।

।।9।।
संसार में दो रूप इन निष्ठा मनुज हैं धारते,
जिस पे स्वयं को दृढ़ बना, हैं धर्म को विस्तारते।
जो ज्ञानियों की राह है, वो ज्ञानयोगायुक्त है,
पथ कर्म योगी का तथा, फल कामना से मुक्त है।

।।10।।
ये पंथ दो हैं, किन्तु इनका लक्ष्य तो है एक ही,
चलकर मनुज इसपर जगाता, शुद्ध आत्म विवेक ही।
ये राह दो हैं किन्तु इनको, पृथक ही मत मान तू,
ये हैं जुड़ी एक-दूसरे से, भेद ये भी जान तू।

।।11।।
बस त्याग करके कर्म को, नर ज्ञान भी पाता नहीं,
और कर्म बिन निष्कर्मता का, बोध भी आता नहीं।
अतएव दोनों राह में, बिन कर्म कुछ होता नहीं,
यह बात जो है जानता, वह मोह में खोता नहीं।

।।12।।
यह सत्य है नर कर्म बिन क्षण एक रह सकता नहीं,
इस नियम को मिथ्या जगत में कोई कह सकता नहीं।
हो प्रकृतिस्थ सदैव नर करता यहाँ पर कर्म है,
गुणधर्म ये है सृष्टि का, संसार का यह मर्म है।

।।13।।
ये प्राकृतिक गुण सृष्टि के नर को प्रभावित कर सखा,
आसक्ति के अंकुर सभी देते हैं उसमें भर सखा।
अतएव ,तू यह जान ले, है कर्म चिंतन से जुड़ा,
चिंतन जुड़ा है बुद्धि से, सम्बन्ध इनका है बड़ा।

।।14।।
इस लोक में बस नर वही उत्तम कहाता है सखा,
आसक्ति तज, जो इन्द्रियों पे वश चलाता है सखा।
संसार का ये सार है, वेदोल्लिखित यह ज्ञान है,
ये है विधाता का नियम, विधि का अनूप विधान है।

।।15।।
इस चक्र से संसार के होता वही बस मुक्त है,
हर कर्म जिस नर का, अकिंचन स्वार्थ से परिमुक्त है।
तू किसलिए इस कर्म के पथ से फिसलता है सखा?
बन दृढ़ नहीं क्यूँ कर्म के पथ पर निकलता है सखा?

।।16।।
क्या पाएगा निष्क्रियता से, सिर्फ़ अपयश पायेगा,
हे वीर! तेरे पास फिर कह और क्या रह जायेगा??
तू श्रेष्ठता का कर वरण, मत हीन हो, मत दीन हो!
उत्तम यही बस राह है, तू कर्मयोगासीन हो।

।।17।।
यह देख किञ्चित सृष्टि का सिद्धांत टलता है नहीं,
बिन कर्म के संसार क्रम देख चलता है नहीं।
जड़जीव, चेतन औ' अचेतन, जानते बिन जानते,
निर्वाह करते हैं तथा, हैं कर्म को ही मानते।

।।18।।
हे धनंजय! पर जान ले इस कर्म में भी भेद है,
सामान्य जन इसको नहीं हैं जानते यर खेद है।
वैसे तो हर इक जीव ही करता यहां पर कर्म है,
लेकिन यहाँ हर कर्म कहलाता नहीं सत्कर्म है।

।।19।।
सद्कर्म है वो मुक्ति जो नर को दिलाता है सखा,
जो आत्म को परमात्म से जाकर मिलता है सखा।
सद्कर्म तो यज्ञ, जिसका फल पुनीत, पवित्र है,
सद्कर्म उद्धारक है नर का, ये हितैषी मित्र है।

।।20।।
जो है नहीं सद्कर्म वो, अपकर्म होता है सखा,
अपकर्म से बस नष्ट नर का धर्म होता है सखा।
सद्कर्म क्या? अपकर्म क्या? ये भी बताता हूँ तुझे,
निश्चिंत होकर बैठ, सुन अब जो सुनता हूँ तुझे।

।।21।
हैं कर्म के दो रूप जो ,सद्कर्म और अपकर्म है,
इसमें छिपा है जो वही, नर की विजय का मर्म है।
वह कर्म जो मानव को बन्धन से दिलाता मुक्ति है,
जिसमें कि जन कल्याण की शुभ भावना की युक्ति है।

।।22।।
वह कर्म जो कर्तव्यपालन के निमित्त किया गया,
जिसमें समाजोत्थान का संदेश दिव्य दिया गया।
वह कर्म जिसका लक्ष्य है, हित साधना हर एक का,
वह कर्म जो प्रतिसाद है, परिशुद्ध आत्मविवेक का।

।।23।।
वह कर्म जो निजता रहित सर्वस्व के हित में रहे,
वह कर्म जो, निष्काम गंगा नीर-सा, पावन बहे।
वह कर्म जो सिखलाए सबमें स्वयं को ही देखना,
वह कर्म जो उज्ज्वल, धवल हो, त्याग की हो देशना।

।।24।।
वह कर्म जो फलकामना कि लालसा से मुक्त हो,
वह कर्म जो प्रतिदान हो, सनकल्पस सेवा युक्त हो।
वह का ही सद्कर्म है, वह कर्म पावन यज्ञ है,
अतिरिक्त इसके जानता जो कर्म को ,वह अज्ञ है।

।।25।।
यह सोच जो तुझको मिला सब है इसी संसार से,
सम्मान ये धन धाम वैभव,सुख विभिन्न प्रकार के।
मानव यहाँ ले जन्म, खाली हाथ आता है सखा,
कर समय अपना पूर्ण खाली हाथ जाता है सखा।

।।26।।
अतएव ऋण संसार का हर एक पर होता सदा,
जिसको चुकाना एक है कर्तव्य ये तेरा बड़ा।
तू इसलिए संसार के हित में लगा निज कर्म को,
संसार सेवा से सुदृढ़ कर वीर अपने धर्म को।

।।27।।
इस रूप में ही कर्म कर, तू मुक्ति पाएगा सखा,
इस राह से तू, योगियों के लोक जाएगा सखा।
संसार में जो कर्म पथ, नर श्रेष्ठ चुनते हैं यहाँ,
अन्यान्य जन भी राह केवल वही चुनते हैं यहाँ।

।।28।।
हाँ ,श्रेष्ठ जन जिस जिस तरह व्यवहार करते हैं यहाँ,
सब लोग अपना काम उस अनुसार करते हैं यहाँ।
वैसे यहाँ जो कर्मयोगी,निजस्वरूपाधीन है,
उसके लिए तो, स्थूल कर्मों की व्यवस्था हीन है।

।।29।।
जो निर्विकारी, निरंकारी, शुद्ध ,चेतन चित्त हो,
जो स्वार्थ, भय, अपमान, चिंता ,से पर हो, रिक्त हो।
निष्काम होकर, ब्रम्ह चिंतन में सदा तल्लीन हो,
जो स्वयं में संतुष्ट हो, जैसे के जल में मीन हो।

।।30।।
जिसको नहीं कुछ चाहिए, आसक्त जो नर है नहीं,
उसके लिए ये कर्म का प्रतिबंध रहता है नहीं।
तू देख मुझको ही ज़रा, तू ही बता क्या सत्य है,
संसार में मेरे लिए क्या काम्य कोई कृत्य है?

।।31।।
ऐसा नहीं कुछ भी यहाँ जो सुलभ मुझको है नहीं,
फिर भी इस कर्म का परित्याग करता मैं नहीं।
यह इसलिए कि मनुज मुझसे प्रेरणा लेकर यहाँ,
निर्वाह करता है सदा कर्तव्य का अपने यहाँ।

।।32।।
यदि कर्म ही मैं न करूँ, तो ले मेरे आदर्श को,
नर त्याग देगा का, देगा जन्म अन्योत्कर्ष को।
इससे अराजकता जगत में, व्याप्त होती जाएगी,
सुख-समृद्धि नर भाग्य से, अप्राप्त होती जाएगी।

।।33।।
इस से जगत का संतुलन ही भंग होता जाएगा,
उत्तर-ओ-उत्तर कूप में अंधे ये खोता जाएगा।
नर हो दिशा से हीन जैसे, दैत्य ही हो जाएगा,
उसमें निहित जो दिव्य गुण है, सदा को खो जाएगा।

।।34।।
अतएव इस संसार में है जो नरों में श्रेष्ठ नर,
वह तो सदा निर्वाह करता है स्वयं का धर्म पर।
जिसके किए हर कर्म का आधार है, जन लाभ ही,
वह लोक के हित हेतु ही, है चाहता धन लाभ भी।

।।35।।
जो लोकसंग्रह रत हुआ, करता यहाँ पे कर्म है,
वह मुक्त होता सृष्टि से, पाता समझ वह मर्म है।
संसार का आधार है, मंगल सभी का चाहना,
सबको स्वयं-सा जानना, सबको स्वयं-सा मानना।

।।36।।
मैं इसलिये धर रूप नर का, सीख हूँ देता यही,
है मनुज का यह धर्म, होना मनुजता का हितैषी।
इस धर्म पर होजा अचल, दैवीयता को पा सखा,
इस मनुजता के धर्म पर, तू प्राण भी आपने लुटा।

।।37।।
इस भाँति अपने धर्म पे रह मरण भी है श्रेयकर,
निज धर्म की रक्षार्थ जो भी बन सके कर वीरवर।
इस मनुजता के धर्म से बढ़कर न कोई पंथ है,
जो पालता इसको नहीं उसका सुनिश्चित अंत है।

।।38।।
सुन कृष्ण की बातें तुरत, अर्जुन पुनः कहने लगा,
हे देव! मेरे हृदय में संदेह होता है बड़ा।
इस धर्म की अनुपम डगर से मनुज क्यूँ होता विलग?
है क्या जो उसको नीतिपथ से, कृष्ण कर देता अलग?

।।39।।
अर्जुन-उवाच:
किससे प्रभावित हो मनुज करता जगत में पाप है?
किस हेतु उसके चित्त में होता सघन संताप है??
केशव मुझे बतलाईये, यह भेद भी समझाइए,
है तमच्छादित हर दिशा, मुझको सुपथ दिखलाइये।

।।40।।
श्री भगवानुवाच:
सुन मित्र तू वह कौन है, जो लक्ष्य नर का भ्रष्ट कर,
उसको गिराता पाप में, सब पुण्य उसका नष्ट कर।
जो जन्म देता काम को, जो पालता है क्रोध को,
जो सर्वदा कुंठित किया करता, मनुज के बोध को।

।।41।।
वो रजोगुण है, राजसी सुख चाहने वाला सखा,
जो भोग से भर बुद्धि को अति क्षीण है करता सखा।
जैसे कि जलती अग्नि को भी ढाँक लेता है धुआँ,
वैसे ही ढँकता ज्ञान को उत्पन्न ये विष काम का।

।।42।।
यह भी बड़ा विज्ञान है, जिस पर न तेरा ध्यान है,
ये इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सब ही, काम के प्रिय स्थान हैं।
इनको कर अपने वश, मनुज को काम संचालित करे,
इनके ही द्वारा काम नर के ज्ञान को खंडित करे।

।।43।।
अतएव, है नरश्रेष्ठ अर्जुन! तू प्रथम ये काम कर,
निज बुद्धि, मन, व इन्द्रियों पर विजय तू अविराम कर।
इस भाँति अपने ज्ञानहंता, काम का कर वध सखा,
सदपंथ पर चलकर, सुनिश्चित जीत अपनी कर सखा।

।।इति श्री कृष्ण अर्पणं अस्तु।।
।।तृतीयोध्याय सम्पूर्ण।।

Sunday, 4 November 2018

ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे...

"ये दीपक रात भर यूँही जलेंगे"

कहानी रात की सारी कहेंगे,
ये दीपक रात भर यूँही जलेंगे।

सियाही रात की सारी धुलेगी,
ये झरने रौशनी के जब बहेंगे।

अकेला दीप जब देगा चुनौती,
अंधेरे हाथ बस अपने मलेंगे।

ख़ुदा! इस नर्म दिल पे वार तीखे,
बता तू ही भला कब तक सहेंगे।

कभी तो चाँद बन के आओगी तुम,
कभी तो आशिक़ों के दिन फिरेंगे।

निशाने पे लगी है जान फिर भी,
क़दम अपने नहीं पीछे करेंगे।

मुहब्बत बस किताबों में बची है,
तेरे इस कौल को झूठा करेंगे।

ग़ज़ल कहने में यों तो मुश्किले हैं,
मगर कोशिश मुसलसल हम करेंगे।

किसी दिन ख़्वाब ये होगा मुक़म्मल,
ख़ुशी के फूल घर-घर में खिलेंगे।

सुबह की इंतजारी शाम से है,
कल उनसे हम बहाने से मिलेंगे।

अगर तुम हाथ थामे चल पड़ोगी,
नहीं हम ज़िन्दगी में फिर गिरेंगे।

ज़रा तुम छेड़ दो तो बात ही क्या?
ये नदिया, पेड़, भी बातें करेंगे।

तुम्हें देखा, खिले कुछ फूल दिल में,
जो मिलने आओ... बागीचे खिलेंगे।

तुम अपनी राह चलते जाओ प्यारे,
खड़े हर मोड़ पर हम ही मिलेंगे।

मुहब्बत का मज़ा है डूबने में,
गधे हैं क्या, जो हम इससे तरेंगे?

सुहानी शाम बन बैठो कभी तो,
सितारे माँग में उजले जड़ेंगे।

डरे हैं जब से शादी हो गई है,
वगरना, हम किसी से क्या डरेंगे??

-अंशुल तिवारी
धनतेरस/ 05.11.18/हरिद्वार।

Monday, 8 October 2018

"वो लोग" और मैं!!!

बस जब से,
ज़िन्दगी का पौधा,
बढ़ने लगा था,
मन तुलनाएँ गढ़ने,
लगा था।
मुझे अब समझ आने लगी थी,
दुनियादारी,
नफ़ा-नुकसान,
अपना-पराया!
समझ आने लगा था कि,
दुनिया में हमारे अलावा भी,
रहते हैं या रहते थे,
"वो लोग"!!!

"वो लोग" जो मुझे कभी भी,
समझ नहीं आए!!!
"वो लोग" जो कहानियों,
का हिस्सा थे,
जो स्वयं एक मुक़म्मल,
किस्सा थे।

कैसे थे "वो लोग"??
कौन थे "वो लोग"??

वो लोग, जो ज़रूरत को,
शौक़ से पहले देखते थे।
वो लोग, जो कुछ नहीं,
फेंकते थे।
वो लोग, जो ज़मीन पर,
बैठकर खाते थे,
वो लोग, जो देहरी के पैर छू कर,
बाहर जाते थे।
वो जिनके घर,
कोई भी आ सकता था,
वो जिनके दर से कोई,
रिक्त नहीं जा सकता था,
मेहमान को जो ,
भगवान-सा ही मानते थे,
जिसे विदाई देते तो,
रास्ते की 2 रोटियाँ बांधते थे।
वो जो किसी के घर आने पर,
पूरियाँ पकाते थे।
स्नेहसिञ्चित मिठाई के,
परात मँगवाते थे।
वो जो "कज़िन" शब्द को नहीं,
जानते थे।
वो जो स्नेह को संबंध की वजह,
मानते थे।
वो जिनके लिए किफ़ायत,
का बड़ा मोल था।
बचत करना,
जिनका उसूल था।
वो जो वक़्त का हिसाब रखते थे,
वो लोग जो यूँही नहीं भटकते थे।
वो लोग, जो कंजूसी दिखाते थे,
पर त्योहारों में दिल खोलकर,
लुटाते थे।
वो जो सालगिरह, जन्मदिन,
बिना कलेंडर याद रख पाते थे।
वो जो पड़ोसी को भी,
अपना कहकर बुलाते थे।
वो जो, दूसरों की ख़ुशी में,
ख़ुश हो जाते थे,
इसी तरह कुछ अपने ग़म,
भूल जाते थे।
वो जो, कपड़ों को,
फटने तक पहनते जाते थे।
लेकिन नया जोड़ा सिर्फ़,
दिवाली में ही सिलाते थे।
वो लोग जो होली पर,
गुझिया बनवाते थे।
घर में ही पकवानों के,
अम्बार लगवाते थे।
वो जो, पैदल चलकर,
बस के पैसे बचाते थे।
वो जो, बचे पैसों की,
टॉफियाँ बच्चों को खिलाते थे।
वो जो, हक़ से डाँटकर,
प्यार दिखाते थे।
बस इसी बात से जो,
उम्रभर याद रह जाते थे।

"वो लोग", जिनका जीना,
जैसे मिसाल था!
जिनकी संघर्ष कथा, कहकर,
घर-आँगन निहाल था।

मेरे आसपास अब,
बहुत कम ही बचे हैं,
"वो लोग"!!!!
वो जो बिन बात सबको,
दुआएँ देते हैं,
वो जो, छोटों की बलाएँ,
ले लेते हैं!!

आधुनिकता की दौड़ में,
आगे बढ़ते ,हारते-जीतते,
जूझते, उलझते!!
मैं समझ चुका हूँ!

हमारे अस्तित्व के लिए,
कितने ज़रूरी हैं,,,
"वो लोग"!!!

वो लोग, जो मिसाल हैं,
वो लोग, जो मशाल हैं!!

-अंशुल तिवारी।
08.10.2018

Monday, 10 September 2018

"दीवारों की ठंडक"

हर घर समय के साथ बदलता है, उसके हालात बदलते हैं।
इस नए-पुराने की कश-म-कश में जीत नए की होती है, और वो जो पुराना होता है चुपचाप बिठा दिया जाता है चकाचौंध से दूर, घर के एकांत कोने में।
हमारे घरों में अक्सर पुरानी चीजों/ यादों को संभालने की ज़िम्मेदारी आ जाती है....बरामदे में सबसे पीछे बने एक छोटे से कमरे पर (स्टोर रूम)....
आइए आज उस कमरे में चलें जो निःशब्द बना कितने वर्षों से मेरे/ आपके घर की यादें सहेज रहा है....जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं!!!

"दीवारों की ठंडक"

मुझे याद है आज भी,
बात मेरे बचपन की,
पसीने से लथपथ हुआ,
भागते-भागते जब कभी।

पहुँच जाता था मैं, अपने घर के उस,
अनजाने बंद कमरे में!!
घर के बरामदे में,
सबसे पीछे बने उस कमरे में।
वो कमरा,
जो ज़्यादा बड़ा नहीं था,
छोटा ही था, और अक्सर,
बंद रहा करता था।

घर में कोई न था,
उसे पूछनेवाला,
जो करता देखभाल उसकी।

सारे घर में पसरा कोलाहल भी जैसे,
ख़त्म-सा हो जाता था,
इसकी चौखट तक आकर।

और ये,
बेजान-बेज़ुबान बना,
यूँही खड़ा रहता था,
अपने बोझ को उठाए।

सम्भवतः, पिछली दीवाली से,
कोई आया भी नहीं था यहाँ।
और इसलिए पड़ चुकी थी धूल,
उन यादों पर,
जो रह रहीं थीं इस कमरे में,
अकेले, जाने कब से???

यादें जो वक़्त के साथ बदलते,
हालातों की कहानी थीं।
ज़िंदा जज़्बातों की बयानी थीं।

रखे थे वहाँ कुछ पुराने रौशनदान,
टूटी लकड़ी की कुर्सियाँ,
और हाल में बदली गई एक चारपाई।

कुछ गुज़रे हुए चेहरे भी,
दीवारों पर टँगे थे...तस्वीरों में क़ैद।
शायद इसलिए,
कि अब ड्रॉइंग रूम की शोख़ दीवार पर,
वे अच्छे नहीं लगते।
या इसलिए, कि वे नहीं कर पाए बराबरी,
वक़्त की रफ़्तार से....!!

अब जो पीढ़ी यहाँ रहती है,
वो उन्हें जानती तक नहीं है।
न वे लोग अब पाए जाते हैं,
कहानियों में ही...!!
वे लोग छूट गए हैं बहुत पीछे...
ज़िन्दगी, आगे निकल आई है।

सुना है!! यही घर का वो पहले कमरा था,
जिसकी ईंटों की जुड़ाई में,
चूने के साथ मिला था, बाबा का पसीना भी।

इसकी ये ऊँची छत, टिकी थी उन्हीं के,
ज़िम्मेदार कांधों पर।

सुना है!! इसे बड़े शौक से रँगवाया गया था,
सारी गली में दावत हुई थी उस रोज़!!

और अब,
बाकी पूरा घर पक्का कंक्रीट का बन गया है,
....शायद इसमें रहने वाले भी...
पैर रखने के लिए भी अब,
शफ्फ़ाक संगमर्मर बिछा है हर ओर!!

पर शायद इस कमरे की ऊबड़खाबड़,
फ़र्श और सीलन भरी दीवारों से,
आज भी मिलती है,
एक अजीब-सी, ठंडक।
ऐसी ठंडक जो अक्सर पाई जाती है,
किसी उम्रदराज़ बरगद की छाँह में,
मित्र की बाँह में,
माँ के आँचल में, या बुज़ुर्गों के साए में।

मैं, इसीलिए मौका मिलते ही,
मॉडर्न कंस्ट्रक्शन की ज़द से निकलकर,
आ बैठता हूँ!!

घर के बरामदे में सबसे पीछे बने,
इस टूटे-फूटे फ़र्श वाले,
पुराने कमरे में,
कुछ देर ही सही, मगर

इस झुलसाती और सुलगाती,
दुनिया से निजात पाने।

- अंशुल तिवारी
09.09.18

Tuesday, 4 September 2018

श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 01

ईश वंदना-
हे विघ्ननाशन! गणपति, तुमको नमन प्रारम्भ में,
पश्चात इसके कर रहा, निज कार्य को आरम्भ मैं।
हे शारदे! सादर नमन मेरा तुम्हें स्वीकार हो,
माँ, ज्ञान, बुद्धि, तेज की तुम ही यहाँ आधार हो।

करुणानिधान सुजान, हे श्रीराम! जय-जय आपकी,
मुझको चरण में दो शरण, कर भस्म जड़ संताप की।
हे विश्वमोहन! शेषशायी, जगत के पालक हरि,
मुझ दीन हेतु नेह की, कीजै प्रवाहित सुरसरि।

भूमिका-
भारत अलौकिक भूमि है, अनुपम है इसकी हर कथा,
जो ज्ञान, गुण, विज्ञान से, भरपूर रहती सर्वथा।
जीवन प्रबंधन के लिए, जो भी ज़रूरी तत्व है,
सब इन कथाओं में निहित है, सार-संग्रह, सत्व है।

हम आज ऐसी ही कथा का, कर रहे उल्लेख हैं,
जिसके सभी संदर्भ चर्चा में, विशिष्ट, विशेष हैं।
है कथा बीते काल की, पर नित नई नूतन लगे,
इसमें वचन श्रीकृष्ण के, हैं ज्ञान, मुक्ति में पगे।

ये भाग है उस ग्रंथ का, जिसको रचा मुनि व्यास ने,
पर जन्म इसको है दिया, कुन्तीतनय की प्यास ने।
हाँ बात हम करते हैं, भारत के महाभारत की ही,
जिसमें जड़ी है, दमकती, अति दिव्य 'गीता'-सी मणि।

श्री व्यास ने इसमें लिखी है मनुज की संभावना,
और साथ ही 'गीता' में लिख दी, मुक्ति की प्रस्तावना।
मानव समाज हुआ कृतार्थ, महर्षि के इस कृत्य से,
सब आवरण हर कर, मिलाया जिसने सबको सत्य से।

मुख्य लेख-
है विदित जन को, जब सुयोधन का अहम सर पर चढ़ा,
निज बंधु का अधिकार करने को हनन आगे बढ़ा।
तब कृष्ण ने चेतावनी दे, यह सुनिश्चित कर दिया,
पांडव न होंगे नत, लड़ेंगे धर्म रचने को नया।

इस के अनंतर युद्ध भीषण, दो दलों में ठन गया,
करने विशिख वृष्टि प्रबल, धनु बाँकुरों का तन गया।
लो आ खड़े हो गए सन्मुख, युद्धथल में स्नेहीजन,
हाँ देखकर जिसको धरा क्या, हिल गया किञ्चित गगन।

दोनों ही ओर समर्थ वीरों का लगा भंडार था,
सेना समूह प्रबल, विशिष्ट, समग्र पारावार था।
पलकें बिछाए था खड़ा विध्वंस कुरु के क्षेत्र में,
जैसे महापावक भरा हो, रुद्र के त्रिनेत्र में।

(धृतराष्ट्र-संजय संवाद)
इस परिस्थिति के जनक, भी बैठे थे अपने कक्ष में,
ले साथ संजय सारथी, रण देखने प्रत्यक्ष में।
धृतराष्ट्र तब बोले वचन निज सूत से विस्मय भरे,
मुझको बताओ युद्ध में,कुरु-पाण्डु सुत क्या कर रहे?

संजय ने मुनिवर व्यास से, ये पा रखा वरदान था,
वह महारण को देखने में, हो गया सज्ञान था।
निज नाथ के सुनकर वचन संजय लगा कहने तभी,
हे भरत कुलभूषण! खड़े हैं सज्ज सब योद्धा अभी।

युवराज गुरुवर द्रोण से आ कर वचन हैं कह रहे,
आचार्य किञ्चित पाण्डुपुत्रों की चमू को देखिए।
है द्रुपदसुत सेनापति, संग विकट योद्धा अन्य हैं,
सात्यकि, कुन्तिभोज, भीम, अर्जुन सभी मूर्धन्य हैं।

मैं देखता हूँ कुछ नए तारे उदित हैं हो गए,
सौभद्र के संग द्रौपदीसुत भी रणोन्मुख हो गए।
हे विप्रवर! ये देखिए इस ओर भी क्या ताप है!
हैं भीष्म सेना के पति, धनु संग तत्पर आप हैं।

आचार्य कृप विजयी, विकर्ण, के संग है तव सुत बली,
भूरिश्रवा हैं, साथ है मम मित्र कर्ण महाबली।
हैं वीर अन्या-अन्य जो मेरे लिए जीवन तजें,
हैं रणकुशल ये सब, उचित है शत्रु ईश्वर को भजें।

जिस सैन्य की रक्षा स्वयं गंगातनय हों कर रहे,
है मनुज की तो बात क्या? ख़ुद देव भी उससे डरें।
अतएव, आप विशिष्ट वीरों का समूह बनाईये,
और शीघ्र कुरुसेनापति सेवार्थ ही पहुंचाइए।

तब वीरवर श्री भीष्म ने, कर सिंह की सी गर्जना,
कर शंखध्वनि अति घोर, दे दी शत्रुदल को वर्जना।
पश्चात इसके अनगिनत रण वाद्य मिलकर बज गए,
सुन घोर स्वर उत्पन्न पाण्डव भी तुरत ही सज गए।

सबसे प्रथम श्वेताशव रथ पर, यदुपति ने यह किया,
वातावरण निज शंख के अति घोर स्वर सेे भर दिया।
पा प्रेरणा इसके अनंतर भीम, अर्जुन उठ गए,
धर्माधिपति संग अनुज सब, रणघोषणा में जुट गए।

जब एक संग ही देवदत्तोपौंड्र का स्वर छा गया,
(देवदत्त-अर्जुन का शंख, पौण्ड्र- भीम का शंख)
ऐसा लगा जैसे निमंत्रण काल था तब पा गया।
हर एक योद्धा शंख लेकर घोर ध्वनि था कर रहा,
ज्यों मृत्यु को ललकार, हुँकार ही था भर रहा।

(श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद)
तब अचानक कुंतीतनय यह कृष्ण से कहने लगा,
हे देव! रणथल मध्य में स्यंदन तनिक कीजै खड़ा।

दुर्बुद्ध दुर्योधन के हित चिंतक यहाँ जो आए हैं,
संग्रामस्थल पर श्याम घन की भाँति ये जो छाए हैं।
में देखना हूँ चाहता आए यहाँ पर कौन हैं,
देकर अधम का साथ भी जो ,शस्त्रसज्जित मौन हैं।

श्री कृष्ण भी क्षण एक में, रथ वेग से लेकर चले,
थे जहाँ सज्जितशस्त्र लेकर भीष्म और गुरुवर खड़े।
बोले वचन तब पार्थ से, लो देख लो जो चाहिए,
तेरे हृदय में अब कोई संशय न रहना चाहिए।

अर्जुन ने जब कर लक्ष्य देखा ,कौरवों की सैन्य को,
अत्यंय मर्माहत हुआ, उपलब्ध होकर दैन्य को।
तब ग्रसित होकर शोक से, वह रुदन था करने लगा,
संकल्प जर्जर हो गया, अर्जुन ठगा-सा रह गया।

साहस समेटा पार्थ ने, और वचन भगवन से कहे,
(विधि का कुरूप विधान कोई भी, भला कब तक सहे)।

है नरोत्तम! ये दृश्य कितना है विकट, विकराल है,
निज बंधुओं के शीष ओर फण खोल बैठा काल है।
हर क्षण इन्हें यों देखकर, मन शोक से है जल रहा,
पल-पल कठिन संताप ये, मेरे हृदय में पल रहा।

हर अंग मेरा शिथिल होकर, शक्ति अपनी खो रहा,
अपने सगे-संबंधियों को देख है मन रो रहा।
हे सखा! देखो वो पितामह भीष्म, कुरुकल ज्येष्ठ हैं,
जो प्रेम के सागर हैं और अति वीर योद्धा श्रेष्ठ हैं।

मैं गोद में जिनकी उछल कर बैठ जाता था कभी,
कैसे है सम्भव युद्ध उनसे कर सकूँगा मैं अभी।
जिस वृक्ष की छाया में पलकर सुख अलौकिक था मिला,
हा!! काटने उसको ही विधि ने, कर दिया मुझको खड़ा।

ये भाग्य ने मुझको दिया, कैसा अनोखा दंड है,
ये अत्यधिक दुष्कर है, कितना क्रूर कर्म प्रचंड है।
ये वीरवर, तेजस्वियों में अग्रणी हैं जो खड़े,
क्या-क्या कहूँ उपकार मुझपर, कर चुके कितने बड़े।

हे कृष्ण! सच कहता हूँ, मेरे पास जो भी ज्ञान है,
सब इन्हीं की निश्छल कृपा का ही हुआ परिणाम है।
मैं तो बड़ा निर्बोध था, मुझको न कोई ज्ञान था,
न बोध था निज शक्ति का, न योग्यता का भान था।

मैं तो पड़ा था कोयले-सा, धूल में लिपटा हुआ,
मैं था शिला का खंड बस, अनगढ़, धरा पर था पड़ा।
जिस पल मुझे गुरुदेव ने निज अंक में धारण किया,
जब प्रेम का पावन अमिय, बिन स्वार्थ, बिन कारण दिया।

मैं देखते ही देखते पत्थर से हीरा हो गया,
अज्ञान का तम मेरे जीवन से सदा को खो गया।
अपने परिश्रम से मुझे पाषाण से प्रतिमा किया,
निज पुत्र सा ही जान कर, जाने कहाँ पहुँचा दिया।

मुझको प्रशिक्षण दे, बनाया धनुर्धर सर्वाग्रणी,
मैं रहूँगा पर्यंत जीवन, इस कृपा के हित ऋणी।
संसार ये जिस रूप में पहचानता है अब मुझे,
वह है मेरे गुरुदेव की ही तो दया का फल सखे!

जिसने पकड़कर हाथ, शर संधान सिखलाया मुझे,
सद्धर्म का, सत्कर्म का, सन्मार्ग दिखलाया मुझे।
जिनकी चरण रज को सदा ही शीष पर मैंने रखा,
कैसे कटेगा शीष उनका हाथ से मेरे भला??

जिस कण्ठ ने मुझको सदा, जय का दिया आशीष था,
किस भाँति उसको बाण से, मैं बींध दूँगा अब भला??
गुरुद्रोह का ही पाप भीषण है, मुझे यह ज्ञात है,
गुरुवध मुझे करना पड़े ,ये तो सघन संताप है।

इससे कहीँ भी हो सकेगा त्राण तो मेरा नहीं,
इस दुःख न मुक्त होगा प्राण ये मेरा कहीँ।

हे कृष्ण! यह सब देख के, है धनुष कर से छूटता,
ये युद्ध का संकल्प होकर क्षीण, अब है टूटता।
मुझको न तो जय चाहिए, न राज्य का ही सुख अहो!
क्या लाभ है? निज बंधुओं को मारने में फिर कहो??

ये हाय! हैं परिवार जन, निज तातसुत, मातुल, सुजन,
हैं भाई, भ्रातृज, श्वसुर हैं, गुरु हैं, पितामह, श्रेष्ठजन।
त्रैलोक्य के भी राज्य हित, इनको नहीं मारूँगा मैं,
कर पुण्य अपना क्षय, कुपथ पर पग नहीं धारूँगा मैं।

ये लोभ ज्वर से ग्रसित हैं, इनको नहीं कुछ भान है,
क्या कर रहे, क्या कर चुके, इनको न इसका ज्ञान है।
लेकिन कृपा से आपकी हम हो गए सज्ञान हैं,
संग्राम हितकारी नहीं होता, हमें यह ध्यान है।

फिर आप क्यों इस पाप में हमको फँसाते हैं प्रभो??
इस घोर दूषित कर्म में, हमको लगाते हैं प्रभो!!

संजय उवाच-
हे नृप! ये कहकर पार्थ ने है, रख दिया अपना धनुष,
रथ पृष्ठ में वह हैं गए, होकर दुखी, रण से विमुख।

।।प्रथमोध्याय समाप्त।।