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Thursday, 8 November 2018

श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 03

।।1।।
निज भक्त हित भगवान क्या हैं आज करते जा रहे,
ले हाथ ख़ुद ही भक्त हैं सुपथ पर ले जा रहे।
हरि जानते हैं हर मनुज में है छिपा अर्जुन कहीं,
जो व्यथित होकर मोह से यूँ त्याग न दे रण कहीं।

।।2।।
इस हेतु ही हरि ने रचा ये परम् गूढ़ विधान है,
कर लक्ष्य अर्जुन को दिया, इस विश्व को यह ज्ञान है।
नर के हृदय के शूल का जो, दिव्य एक निदान है,
नर जाति जिस से पाएगी, भविकाल में उत्थान है।

।।3।।
हम आइए अब देखते हैं, क्या हुआ आगे भला?
सुनकर विनय पृथुूपुत्र  की गोविंद ने फिर क्या कहा?
अब क्या नाइ चिंता धनंजय के हृदय में आ गई?
जो ज्ञान रवि ओर बादलों की भाँति आकर छा गई।

अर्जुन उवाच:
।।4।।
केशव कहा जो आपने मैं सोचता हूँ जब उसे,
भ्रम का बड़ा यह जाल आकर निकट ग्रसता है मुझे।
है ज्ञान उत्तम कर्म से यह आपने ही है कहा,
फिर क्यूं भयंकर कर्म में मुझको फँसाते हैं भला।

।।5।।
करुणानिधे क्यूँ नाश का पथ आप हैं दिखला रहे,
क्यूँ युद्ध करने की कला, मुझको यहाँ सिखला रहे।
संबंधियों के रक्त से, कैसे धरा को पाट दूँ,
कुल अग्रजों का शीष उन्नत, किस तरह मैं काट दूँ।

।।6।।
ये कर्म कुत्सित है, मलिन है, ये भयंकर पाप है,
मुझसे अधिक इस बात को, ख़ुद जानते हरि आप हैं।
मैं ज्ञान के पथ पर चलूँ, या कर्म को सर पर धरूँ,
इस द्वंद्व में मैं फंस गया, केशव कहो अब क्या करूँ?

।।7।।
भ्रमजाल मेरा काटिए, तम की घटाएँ छाँटिए,
दृढ़ निश्चयी हो जाऊं मैं, कुछ ज्ञान ऐसा बाँटिये।
इस द्वन्द्व से मुझको बचाकर शरण में लेलो प्रभो,
कल्याण जिस से हो मेरा, वह भेद भी मुझसे कहा।

श्री भगवानुवाच:
।।8।।
अर्जुन समझ इस बात को, जो आज कहता हूँ तुझे,
सन्देह के भ्रमजाल से मैं मुक्त करता हूँ तुझे।
अब तक कहा मैन तुझे इस लोक के अचार को,
निष्ठा मनुज के लोक की, इसके सकल विस्तार को।

।।9।।
संसार में दो रूप इन निष्ठा मनुज हैं धारते,
जिस पे स्वयं को दृढ़ बना, हैं धर्म को विस्तारते।
जो ज्ञानियों की राह है, वो ज्ञानयोगायुक्त है,
पथ कर्म योगी का तथा, फल कामना से मुक्त है।

।।10।।
ये पंथ दो हैं, किन्तु इनका लक्ष्य तो है एक ही,
चलकर मनुज इसपर जगाता, शुद्ध आत्म विवेक ही।
ये राह दो हैं किन्तु इनको, पृथक ही मत मान तू,
ये हैं जुड़ी एक-दूसरे से, भेद ये भी जान तू।

।।11।।
बस त्याग करके कर्म को, नर ज्ञान भी पाता नहीं,
और कर्म बिन निष्कर्मता का, बोध भी आता नहीं।
अतएव दोनों राह में, बिन कर्म कुछ होता नहीं,
यह बात जो है जानता, वह मोह में खोता नहीं।

।।12।।
यह सत्य है नर कर्म बिन क्षण एक रह सकता नहीं,
इस नियम को मिथ्या जगत में कोई कह सकता नहीं।
हो प्रकृतिस्थ सदैव नर करता यहाँ पर कर्म है,
गुणधर्म ये है सृष्टि का, संसार का यह मर्म है।

।।13।।
ये प्राकृतिक गुण सृष्टि के नर को प्रभावित कर सखा,
आसक्ति के अंकुर सभी देते हैं उसमें भर सखा।
अतएव ,तू यह जान ले, है कर्म चिंतन से जुड़ा,
चिंतन जुड़ा है बुद्धि से, सम्बन्ध इनका है बड़ा।

।।14।।
इस लोक में बस नर वही उत्तम कहाता है सखा,
आसक्ति तज, जो इन्द्रियों पे वश चलाता है सखा।
संसार का ये सार है, वेदोल्लिखित यह ज्ञान है,
ये है विधाता का नियम, विधि का अनूप विधान है।

।।15।।
इस चक्र से संसार के होता वही बस मुक्त है,
हर कर्म जिस नर का, अकिंचन स्वार्थ से परिमुक्त है।
तू किसलिए इस कर्म के पथ से फिसलता है सखा?
बन दृढ़ नहीं क्यूँ कर्म के पथ पर निकलता है सखा?

।।16।।
क्या पाएगा निष्क्रियता से, सिर्फ़ अपयश पायेगा,
हे वीर! तेरे पास फिर कह और क्या रह जायेगा??
तू श्रेष्ठता का कर वरण, मत हीन हो, मत दीन हो!
उत्तम यही बस राह है, तू कर्मयोगासीन हो।

।।17।।
यह देख किञ्चित सृष्टि का सिद्धांत टलता है नहीं,
बिन कर्म के संसार क्रम देख चलता है नहीं।
जड़जीव, चेतन औ' अचेतन, जानते बिन जानते,
निर्वाह करते हैं तथा, हैं कर्म को ही मानते।

।।18।।
हे धनंजय! पर जान ले इस कर्म में भी भेद है,
सामान्य जन इसको नहीं हैं जानते यर खेद है।
वैसे तो हर इक जीव ही करता यहां पर कर्म है,
लेकिन यहाँ हर कर्म कहलाता नहीं सत्कर्म है।

।।19।।
सद्कर्म है वो मुक्ति जो नर को दिलाता है सखा,
जो आत्म को परमात्म से जाकर मिलता है सखा।
सद्कर्म तो यज्ञ, जिसका फल पुनीत, पवित्र है,
सद्कर्म उद्धारक है नर का, ये हितैषी मित्र है।

।।20।।
जो है नहीं सद्कर्म वो, अपकर्म होता है सखा,
अपकर्म से बस नष्ट नर का धर्म होता है सखा।
सद्कर्म क्या? अपकर्म क्या? ये भी बताता हूँ तुझे,
निश्चिंत होकर बैठ, सुन अब जो सुनता हूँ तुझे।

।।21।
हैं कर्म के दो रूप जो ,सद्कर्म और अपकर्म है,
इसमें छिपा है जो वही, नर की विजय का मर्म है।
वह कर्म जो मानव को बन्धन से दिलाता मुक्ति है,
जिसमें कि जन कल्याण की शुभ भावना की युक्ति है।

।।22।।
वह कर्म जो कर्तव्यपालन के निमित्त किया गया,
जिसमें समाजोत्थान का संदेश दिव्य दिया गया।
वह कर्म जिसका लक्ष्य है, हित साधना हर एक का,
वह कर्म जो प्रतिसाद है, परिशुद्ध आत्मविवेक का।

।।23।।
वह कर्म जो निजता रहित सर्वस्व के हित में रहे,
वह कर्म जो, निष्काम गंगा नीर-सा, पावन बहे।
वह कर्म जो सिखलाए सबमें स्वयं को ही देखना,
वह कर्म जो उज्ज्वल, धवल हो, त्याग की हो देशना।

।।24।।
वह कर्म जो फलकामना कि लालसा से मुक्त हो,
वह कर्म जो प्रतिदान हो, सनकल्पस सेवा युक्त हो।
वह का ही सद्कर्म है, वह कर्म पावन यज्ञ है,
अतिरिक्त इसके जानता जो कर्म को ,वह अज्ञ है।

।।25।।
यह सोच जो तुझको मिला सब है इसी संसार से,
सम्मान ये धन धाम वैभव,सुख विभिन्न प्रकार के।
मानव यहाँ ले जन्म, खाली हाथ आता है सखा,
कर समय अपना पूर्ण खाली हाथ जाता है सखा।

।।26।।
अतएव ऋण संसार का हर एक पर होता सदा,
जिसको चुकाना एक है कर्तव्य ये तेरा बड़ा।
तू इसलिए संसार के हित में लगा निज कर्म को,
संसार सेवा से सुदृढ़ कर वीर अपने धर्म को।

।।27।।
इस रूप में ही कर्म कर, तू मुक्ति पाएगा सखा,
इस राह से तू, योगियों के लोक जाएगा सखा।
संसार में जो कर्म पथ, नर श्रेष्ठ चुनते हैं यहाँ,
अन्यान्य जन भी राह केवल वही चुनते हैं यहाँ।

।।28।।
हाँ ,श्रेष्ठ जन जिस जिस तरह व्यवहार करते हैं यहाँ,
सब लोग अपना काम उस अनुसार करते हैं यहाँ।
वैसे यहाँ जो कर्मयोगी,निजस्वरूपाधीन है,
उसके लिए तो, स्थूल कर्मों की व्यवस्था हीन है।

।।29।।
जो निर्विकारी, निरंकारी, शुद्ध ,चेतन चित्त हो,
जो स्वार्थ, भय, अपमान, चिंता ,से पर हो, रिक्त हो।
निष्काम होकर, ब्रम्ह चिंतन में सदा तल्लीन हो,
जो स्वयं में संतुष्ट हो, जैसे के जल में मीन हो।

।।30।।
जिसको नहीं कुछ चाहिए, आसक्त जो नर है नहीं,
उसके लिए ये कर्म का प्रतिबंध रहता है नहीं।
तू देख मुझको ही ज़रा, तू ही बता क्या सत्य है,
संसार में मेरे लिए क्या काम्य कोई कृत्य है?

।।31।।
ऐसा नहीं कुछ भी यहाँ जो सुलभ मुझको है नहीं,
फिर भी इस कर्म का परित्याग करता मैं नहीं।
यह इसलिए कि मनुज मुझसे प्रेरणा लेकर यहाँ,
निर्वाह करता है सदा कर्तव्य का अपने यहाँ।

।।32।।
यदि कर्म ही मैं न करूँ, तो ले मेरे आदर्श को,
नर त्याग देगा का, देगा जन्म अन्योत्कर्ष को।
इससे अराजकता जगत में, व्याप्त होती जाएगी,
सुख-समृद्धि नर भाग्य से, अप्राप्त होती जाएगी।

।।33।।
इस से जगत का संतुलन ही भंग होता जाएगा,
उत्तर-ओ-उत्तर कूप में अंधे ये खोता जाएगा।
नर हो दिशा से हीन जैसे, दैत्य ही हो जाएगा,
उसमें निहित जो दिव्य गुण है, सदा को खो जाएगा।

।।34।।
अतएव इस संसार में है जो नरों में श्रेष्ठ नर,
वह तो सदा निर्वाह करता है स्वयं का धर्म पर।
जिसके किए हर कर्म का आधार है, जन लाभ ही,
वह लोक के हित हेतु ही, है चाहता धन लाभ भी।

।।35।।
जो लोकसंग्रह रत हुआ, करता यहाँ पे कर्म है,
वह मुक्त होता सृष्टि से, पाता समझ वह मर्म है।
संसार का आधार है, मंगल सभी का चाहना,
सबको स्वयं-सा जानना, सबको स्वयं-सा मानना।

।।36।।
मैं इसलिये धर रूप नर का, सीख हूँ देता यही,
है मनुज का यह धर्म, होना मनुजता का हितैषी।
इस धर्म पर होजा अचल, दैवीयता को पा सखा,
इस मनुजता के धर्म पर, तू प्राण भी आपने लुटा।

।।37।।
इस भाँति अपने धर्म पे रह मरण भी है श्रेयकर,
निज धर्म की रक्षार्थ जो भी बन सके कर वीरवर।
इस मनुजता के धर्म से बढ़कर न कोई पंथ है,
जो पालता इसको नहीं उसका सुनिश्चित अंत है।

।।38।।
सुन कृष्ण की बातें तुरत, अर्जुन पुनः कहने लगा,
हे देव! मेरे हृदय में संदेह होता है बड़ा।
इस धर्म की अनुपम डगर से मनुज क्यूँ होता विलग?
है क्या जो उसको नीतिपथ से, कृष्ण कर देता अलग?

।।39।।
अर्जुन-उवाच:
किससे प्रभावित हो मनुज करता जगत में पाप है?
किस हेतु उसके चित्त में होता सघन संताप है??
केशव मुझे बतलाईये, यह भेद भी समझाइए,
है तमच्छादित हर दिशा, मुझको सुपथ दिखलाइये।

।।40।।
श्री भगवानुवाच:
सुन मित्र तू वह कौन है, जो लक्ष्य नर का भ्रष्ट कर,
उसको गिराता पाप में, सब पुण्य उसका नष्ट कर।
जो जन्म देता काम को, जो पालता है क्रोध को,
जो सर्वदा कुंठित किया करता, मनुज के बोध को।

।।41।।
वो रजोगुण है, राजसी सुख चाहने वाला सखा,
जो भोग से भर बुद्धि को अति क्षीण है करता सखा।
जैसे कि जलती अग्नि को भी ढाँक लेता है धुआँ,
वैसे ही ढँकता ज्ञान को उत्पन्न ये विष काम का।

।।42।।
यह भी बड़ा विज्ञान है, जिस पर न तेरा ध्यान है,
ये इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सब ही, काम के प्रिय स्थान हैं।
इनको कर अपने वश, मनुज को काम संचालित करे,
इनके ही द्वारा काम नर के ज्ञान को खंडित करे।

।।43।।
अतएव, है नरश्रेष्ठ अर्जुन! तू प्रथम ये काम कर,
निज बुद्धि, मन, व इन्द्रियों पर विजय तू अविराम कर।
इस भाँति अपने ज्ञानहंता, काम का कर वध सखा,
सदपंथ पर चलकर, सुनिश्चित जीत अपनी कर सखा।

।।इति श्री कृष्ण अर्पणं अस्तु।।
।।तृतीयोध्याय सम्पूर्ण।।

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