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Tuesday, 12 December 2017

जब कभी तुम्हें!!!

जब कभी,

जब कभी मैं,
तुम्हें देखता हूँ।
तो पाता हूँ, तुमको,

किसी सुहाने ख़्वाब से उपजी,
मीठी मुस्कुराहट जैसा।

बेबाक छिटकती चाँदनी के,
रेशमी धागों सा महीन।

या,
अल-सुबह गुलाब की पंखुड़ियों से,
लिपटी शबनम-सा पाकीज़ा।

जब कभी मैं,
तुम्हें देखता हूँ।
तो लगता है,
तमन्नाएँ ओढ़कर इंसानी लिबास,
मुक़म्मल हो उठी हैं।

-अंशुल तिवारी।

Thursday, 9 November 2017

इस दीवाली...

शहर से घर लौट रहा हूँ,
सोच रहा हूँ,
क्या ले जाऊँ घर, घरवालों के लिए,
माँ के लिए...पापा के लिए....
फिर सोचा कि,
अब तो घर के आस-पास भी
सब मिल ही जाता है।
वो सब कुछ जो ज़रूरी होता है।
या ज़रूरी न हो तो भी मिल जाता है।
सजावट का सामान,
साड़ियाँ, कीमती कपड़े, सब कुछ।
smart phone, accessories वगैरह।
फिर क्या ले जाऊँ, समस्या गंभीर है??
शायद वक़्त???
हाँ, सबकुछ तो है सिर्फ वक़्त नहीं मिलता!!
सोचता हूँ इस बार, घर वालों के लिए,
ये वक़्त ही ले जाऊँ,
कुछ बातें, कुछ किस्से, कुछ मीठी नोक-झोंक,
कुछ चुटकुले, कुछ रात, कुछ दिन, कुछ पल।

हाँ, अब उन्हें भी मुझसे यही चाहिए।

बस तय हो गया,

इस दिवाली, मैं घर ले जा रहा हूँ,
वक़्त, मेरा वक़्त, उनका वक़्त...

-अंशुल।

जीता कौन???

मुझे बचपन से सिखा दिया गया था,
फ़र्क जीतने का और हारने का।
और मैं भी ये समझ गया था,
कि मेरे जीतने और हारनेे के मापदंड,
तय वो करेंगे,
जो मुझे जानते ही नहीं,
जिनके लिए मेरे अस्तित्व का कोई सकारात्मक,
मोल नहीं था।
कोई value नहीं थी।
वे तो बस अपनी स्वतंत्रता रखते थे,
ये निर्णय करने की, कि मैं कौन हूँ?
और क्या हो सकता हूँ?
वो जिन्होंने कभी मुझसे बात तक नहीं की,
या कि कभी पूछा मेरा हाल।
और मैं भी बिन समझे,
जुट गया, बलात थोपे हुए दायित्वों,
मापदंडों, अपेक्षाओं को ढोने में।
खच्चरों की तरह, हाँका जाने लगा,
एक ही ढर्रे में।
लेकिन भरपूर कोशिश करके भी,
में असफ़ल ही रहा,
नाकारा ही रहा।
भला ये कैसे संभव है??
कि मछली कोशिश करके,
सीख जाए उड़ना,
या, परिंदे अभ्यास कर लें तैरने का।
पर मैंने कोशिश नहीं छोड़ी,
लगा रहा, जुटा रहा,
क्योंकि मैंने ये भी समझा था,
कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
ये सत्य भी है!!
मेरी कोशिश घिस-घिस के चमक रही है अब।
और चमकेगी...
उनके मापदंडों के अनुसार अब,
मैं जीत रहा हूँ।
क्या वाकई???
पता नहीं ये जीतने वाला में ही हूँ,
या है और कोई, मेरी ही शक़्ल में???

-अंशुल।

Thursday, 2 November 2017

बहू चाहिए।।

ये व्यंग केवल मनो विनोद के दृष्टिकोण से लिखा गया है।
एक सामान्य प्रस्तुति है। इसे इसी भावना के साथ लिया जाए।

व्यंग- बहू चाहिए।।

सुनो सुनो भई ध्यान लगाकर, खोलो कर्ण के द्वार।
Market फिर से सबल हुआ है, बदल गयी सरकार।

नया trend अंदाज़ पुराना, फिर आया एक बार।
नए नवेले पढ़े लिखों की, हो गयी है भरमार।

करें आप भी इसमें invest, गर्म है ये बाज़ार।
धूम धाम से लौटा है ये परिणय का त्यौहार।

अपने अपने products लेकर, खड़े हैं पालनहार।
Matrimonial book हैं, marriage bureau भी बेज़ार।

जित देखूँ तित लोग खड़े हैं, लंबी करे कतार।
अपना नंबर कब आयेगा, करते इंतज़ार।

अगला नम्बर चौबे जी का, सेवक रहा पुकार।
सुनके उनके बुझे बुझे मुखड़े पे थी चमकार।

भीतर आके देखा तो था सजा हुआ दरबार।
खड़े हुए थे फरियादी सब ले करके दरकार।

सोचा पहल करें खुद ही थे चौबे जी तैयार।
दृढ निश्चय के साथ बढे, counter पे आखिरकार।

बड़े गर्व से गरज के बोले, बहू चाहिए सुन्दर।
काम काज में तेज़ रहे, सद्गुण हों सारे अंदर।

मीठी बोली कोयल सी हो, नीति रीति में लीन।
प्रजातंत्र को न माने, जो रहे राज्य आधीन।

बुद्धि से हो सरस्वती, हो लक्ष्मी का जो रूप।
लाना हो जो साथ लाये, अपनी इच्छा अनुरूप।

सुंदरता हो परम दिव्य, नित पहने नया जो गहना।
और ब्याह उपरांत लाए संग, बस तो फिर क्या कहना।

किन्तु ध्यान ये रखना उसको हो न गया बहकाया।
और न उसपर हो "काली" या "दुर्गा" रूप की छाया।

गौमाता सी शीलवती हो, रहे जो शीष झुकाय।
क्रोधहीन, इच्छाविहीन, मुनियों सा समय बिताए।

डॉक्टर हो, engineer हो, या management की ज्ञाता।
बड़ी कुशलता से घर का सब काम हो करना आता।

चाहे पढ़ी लिखी हो जितनी, नाम भी खूब कमाए।
पर technical प्रज्ञा अपनी, "चौके" में अजमाए।

नहीं रूढ़ी के वादी हम, हैं परम्परा के पालक।
करें नहीं अन्याय कभी हम धर्म ध्वजा के धारक।

नर और नारी में न करते किसी विधि हम भेद।
पर पति से है ज़्यादा तनख़्वाह, इतना ही है खेद।

और नारी के लिए भी है तो सरल मार्ग बतलाया।
मुक्त हुई वह ललना, जिसने घर में ध्यान लगाया।

इसीलिए हम कहते, काहे नौकर किसी का बनना।
करो धर्म का पालन, के सौभाग्य है सेवा करना।

और है अंतिम आस यही वो हमको स्वर्ग दिलाये।
नेत्र बंद होने से पहले, "पौत्र" का मुख दिखलाये।

ये सारे गुण हों उसमे, ये बात बड़ी है नेक।
किन्तु चाहिए, बड़ा ज़रूरी, सुनो!! विशेषण एक।

सुत को अपने कितनी निष्ठा से हमने पढ़वाया।
Donation की भेंट चढ़ा के degree तक पहुँचाया।

नहीं चाहते हम दहेज़, करते हैं सख्त विरोध।
पर नहीं मिलेगा लड़का ऐसा, देखें करके शोध।

हमें चाहिए ये के गुणों का आप करें सम्मान।
और जगत को बस दे दें, इसका एक लघु प्रमाण।

किसी बड़ी building में खुलवा दें उसका एक दफ्तर।
फिर देखें क्या गर्व करेंगे आप भी उसके ऊपर।

ऐसे जामाता को पाकर धन्य पीढियां होंगी।
कर बखान सौभाग्य का अपने, बस कृतार्थ वे होंगी।

चौबे जी की सुन अभिलाषा, आह!! उठी इक मन से।
डूब मरो रे नीच!! जो जीते रक्त चूसकर तन से।

है धिक्कार जन्म को तेरे, माँ की कोख लजाए।
पितरों को अभिशप्त करे, कुल पे कलंक लगवाए।

क्षमा प्रार्थना-

क्षमा चाहता हूँ मैं जो कुछ हुआ हो मुझसे दोष।
नहीं आप पर हे समाज!!, दुर्जन पर है ये रोष।

-अंशुल।।

निवेदन-
व्यंग को व्यंग की तरह ही लें और आनंद उठायें।।

Saturday, 14 October 2017

वटवृक्ष

वटवृक्ष...
राह में चलते हुए , कुछ देखकर मैं रुक गया,
भीड़ की दीवार थी इक, वृक्ष को घेरे हुए।

है सुशोभन वृक्ष कितना , थे यही सब कह रहे,
वाह!! क्या सर्वांग सुंदर है ये वृक्ष विशाल-सा।

देखकर सौंदर्य उसका, जन सभी मोहित हुए,
देखने वालों के मन को था, वो सुख से भर रहा।

थे रखे किसने यहाँ पर, बीज इस द्रुम के कभी??
था ये एक संयोग या फिर, फल किसी संकल्प का??

योजना जो भी हो विधि की, वृक्ष था अद्भुत मगर,
था घना, शालीन अतिशय, नींव से अतिशय सुदृढ़।

पर विलक्षण और भी इक गुण जो था उस वृक्ष में,
कर दिया जिसने अचंभित सबको था, प्रत्यक्ष में।

बढ़ रहा था वो निरंतर पा के दृष्टि पात को,
जान पाया न कोई जन इस विलक्षण बात को।

जो भी उसको देखता, बढ़ता हुआ ही पा रहा था,
ध्यान सबका प्राप्त कर ,वह और बढ़ता जा रहा था।

वृक्ष की शोभा में डूबे लोग वर्णन कर रहे थे,
छाँह में बैठे हुए, कुछ देख सुख से भर रहे थे।

कुछ घड़ी बीती, समय ज्यों कुछ क़दम आगे चला,
तब अचानक कुछ घटा जो, रच गया विस्मय नया??

दृश्य था जो परम् सुंदर, क्रूर था अब हो गया,
मोद और आनंद अब प्रत्येक जन का खो गया।

अब उपस्थित था वहाँ वह, दृश्य अति विकराल था,
तमोरंजित हर दिशा, सामने आया काल था।

लीलने को सूर्य को, वह वृक्ष बढ़ता ही गया,
हर जगह से रोशनी को तीव्रता से पी गया।

लग रहा था लीलने नभ को बढ़ा अहिराज हो,
जैसे सृष्टि का विलय होने ही वाला आज हो।

थे सशंकित लोग सब, यह क्या हुआ?? यह क्या हुआ??
क्रूरता अब देखिए करती है क्या, करतब नया??

हर दिशा, दिग अंत में, फैला हुआ वटवृक्ष था,
खेद, चिंता, दुःख का, सागर वहाँ प्रत्यक्ष था।

स्वर सभी आनंद के चीत्कार से थे बन गए,
देखकर भयभीत जन को, वृक्ष पल्लव तन गए।

सर उठाए व्योम तक, वटवृक्ष फैला नाग-सा,
था गरल करता वमन, जो जल रहा था आग-सा।

सत्य को करता पराजित, जड़ जमाए था खड़ा,
मैं ही हूँ सर्वस्व स्वामी, इस कथन पर था अड़ा।

ये नहीं था वृक्ष कोई, ये "अहं" मेरा ही था,
घेर कर मुझको खड़ा, "अभिमान" ये मेरा ही था।

अब न था कोई वहाँ पर "पर", वहाँ "मैं" ही तो था,
रौंदकर मुझको चरण से, मैं ही था मुझपर खड़ा।

अब न था कोई साथ मेरे, बस गहन तम था खड़ा,
हाय!! ये अभिमान मेरा, हो गया कितना बड़ा??

अब न तो आनंद था, ना कोई साथी संग था,
अब निहित मेरे लिए, बस एक काला रंग था।

मैंने पा कर तुच्छ लब्धि, बोध अपना खो गया,
और पत्थर के लिए, आनंद हीरा खो दिया।

- अंशुल।
14.10.2017
पुणे।

Friday, 13 October 2017

कविता का जन्म...

कविता,,,

चट्टानों का हृदय चीरकर,
ज्यों उग आता है नव अंकुर,
उस अंकुर की हरी दूब-सी,
मन में स्वयं उभरती कविता।

भोर भए ललकार तिमिर को,
सूरज की मद्धम किरणों-सी।
जैसे जगत प्रकाशित करती,
नभ से स्वयं उतरती कविता।

साँझ ढले आकाश में ऊँचे,
एक छोर से परम क्षितिज तक।
साथ परिंदों का लेकर के,
खुले गगन में उड़ती कविता।

और कभी बूंदों में ढलकर,
मेघों की गोदी से गिरकर।
बूँद-बूँद से सागर बनकर,
कागज़ तले मचलती कविता।

सच है, वो मिलने आती है,
दबे पैर और चोरी- चोरी।
अपनी ही मर्ज़ी की मालिक,
खुद मनमानी करती कविता।

- अंशुल।

Monday, 25 September 2017

तजुर्बा...

सारे क़िस्से की तर्जुमानी है,
बात थी राज़, अब ज़बानी है।

मिल भी जाए तो साथ क्या देगी?
यहाँ हर शै है क्या, बेमानी है।

जिसको दिल से लगाए बैठे हो,
ये क़ुर्बत-ए-जहाँ भी फ़ानी है।

हस्ती क्या है तुम्हारी और मेरी,
जैसे कोई मौज आनी-जानी है।

करवटें हर कदम पे लेती है,
ज़िन्दगी, पेचीदा कहानी है।

प्यार, सच्चाई, वफ़ादारी की,
बात अब हो चुकी पुरानी है।

-अंशुल तिवारी।