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Sunday, 4 November 2018

ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे...

"ये दीपक रात भर यूँही जलेंगे"

कहानी रात की सारी कहेंगे,
ये दीपक रात भर यूँही जलेंगे।

सियाही रात की सारी धुलेगी,
ये झरने रौशनी के जब बहेंगे।

अकेला दीप जब देगा चुनौती,
अंधेरे हाथ बस अपने मलेंगे।

ख़ुदा! इस नर्म दिल पे वार तीखे,
बता तू ही भला कब तक सहेंगे।

कभी तो चाँद बन के आओगी तुम,
कभी तो आशिक़ों के दिन फिरेंगे।

निशाने पे लगी है जान फिर भी,
क़दम अपने नहीं पीछे करेंगे।

मुहब्बत बस किताबों में बची है,
तेरे इस कौल को झूठा करेंगे।

ग़ज़ल कहने में यों तो मुश्किले हैं,
मगर कोशिश मुसलसल हम करेंगे।

किसी दिन ख़्वाब ये होगा मुक़म्मल,
ख़ुशी के फूल घर-घर में खिलेंगे।

सुबह की इंतजारी शाम से है,
कल उनसे हम बहाने से मिलेंगे।

अगर तुम हाथ थामे चल पड़ोगी,
नहीं हम ज़िन्दगी में फिर गिरेंगे।

ज़रा तुम छेड़ दो तो बात ही क्या?
ये नदिया, पेड़, भी बातें करेंगे।

तुम्हें देखा, खिले कुछ फूल दिल में,
जो मिलने आओ... बागीचे खिलेंगे।

तुम अपनी राह चलते जाओ प्यारे,
खड़े हर मोड़ पर हम ही मिलेंगे।

मुहब्बत का मज़ा है डूबने में,
गधे हैं क्या, जो हम इससे तरेंगे?

सुहानी शाम बन बैठो कभी तो,
सितारे माँग में उजले जड़ेंगे।

डरे हैं जब से शादी हो गई है,
वगरना, हम किसी से क्या डरेंगे??

-अंशुल तिवारी
धनतेरस/ 05.11.18/हरिद्वार।

Monday, 8 October 2018

"वो लोग" और मैं!!!

बस जब से,
ज़िन्दगी का पौधा,
बढ़ने लगा था,
मन तुलनाएँ गढ़ने,
लगा था।
मुझे अब समझ आने लगी थी,
दुनियादारी,
नफ़ा-नुकसान,
अपना-पराया!
समझ आने लगा था कि,
दुनिया में हमारे अलावा भी,
रहते हैं या रहते थे,
"वो लोग"!!!

"वो लोग" जो मुझे कभी भी,
समझ नहीं आए!!!
"वो लोग" जो कहानियों,
का हिस्सा थे,
जो स्वयं एक मुक़म्मल,
किस्सा थे।

कैसे थे "वो लोग"??
कौन थे "वो लोग"??

वो लोग, जो ज़रूरत को,
शौक़ से पहले देखते थे।
वो लोग, जो कुछ नहीं,
फेंकते थे।
वो लोग, जो ज़मीन पर,
बैठकर खाते थे,
वो लोग, जो देहरी के पैर छू कर,
बाहर जाते थे।
वो जिनके घर,
कोई भी आ सकता था,
वो जिनके दर से कोई,
रिक्त नहीं जा सकता था,
मेहमान को जो ,
भगवान-सा ही मानते थे,
जिसे विदाई देते तो,
रास्ते की 2 रोटियाँ बांधते थे।
वो जो किसी के घर आने पर,
पूरियाँ पकाते थे।
स्नेहसिञ्चित मिठाई के,
परात मँगवाते थे।
वो जो "कज़िन" शब्द को नहीं,
जानते थे।
वो जो स्नेह को संबंध की वजह,
मानते थे।
वो जिनके लिए किफ़ायत,
का बड़ा मोल था।
बचत करना,
जिनका उसूल था।
वो जो वक़्त का हिसाब रखते थे,
वो लोग जो यूँही नहीं भटकते थे।
वो लोग, जो कंजूसी दिखाते थे,
पर त्योहारों में दिल खोलकर,
लुटाते थे।
वो जो सालगिरह, जन्मदिन,
बिना कलेंडर याद रख पाते थे।
वो जो पड़ोसी को भी,
अपना कहकर बुलाते थे।
वो जो, दूसरों की ख़ुशी में,
ख़ुश हो जाते थे,
इसी तरह कुछ अपने ग़म,
भूल जाते थे।
वो जो, कपड़ों को,
फटने तक पहनते जाते थे।
लेकिन नया जोड़ा सिर्फ़,
दिवाली में ही सिलाते थे।
वो लोग जो होली पर,
गुझिया बनवाते थे।
घर में ही पकवानों के,
अम्बार लगवाते थे।
वो जो, पैदल चलकर,
बस के पैसे बचाते थे।
वो जो, बचे पैसों की,
टॉफियाँ बच्चों को खिलाते थे।
वो जो, हक़ से डाँटकर,
प्यार दिखाते थे।
बस इसी बात से जो,
उम्रभर याद रह जाते थे।

"वो लोग", जिनका जीना,
जैसे मिसाल था!
जिनकी संघर्ष कथा, कहकर,
घर-आँगन निहाल था।

मेरे आसपास अब,
बहुत कम ही बचे हैं,
"वो लोग"!!!!
वो जो बिन बात सबको,
दुआएँ देते हैं,
वो जो, छोटों की बलाएँ,
ले लेते हैं!!

आधुनिकता की दौड़ में,
आगे बढ़ते ,हारते-जीतते,
जूझते, उलझते!!
मैं समझ चुका हूँ!

हमारे अस्तित्व के लिए,
कितने ज़रूरी हैं,,,
"वो लोग"!!!

वो लोग, जो मिसाल हैं,
वो लोग, जो मशाल हैं!!

-अंशुल तिवारी।
08.10.2018

Monday, 10 September 2018

"दीवारों की ठंडक"

हर घर समय के साथ बदलता है, उसके हालात बदलते हैं।
इस नए-पुराने की कश-म-कश में जीत नए की होती है, और वो जो पुराना होता है चुपचाप बिठा दिया जाता है चकाचौंध से दूर, घर के एकांत कोने में।
हमारे घरों में अक्सर पुरानी चीजों/ यादों को संभालने की ज़िम्मेदारी आ जाती है....बरामदे में सबसे पीछे बने एक छोटे से कमरे पर (स्टोर रूम)....
आइए आज उस कमरे में चलें जो निःशब्द बना कितने वर्षों से मेरे/ आपके घर की यादें सहेज रहा है....जिन्हें हम भूलते जा रहे हैं!!!

"दीवारों की ठंडक"

मुझे याद है आज भी,
बात मेरे बचपन की,
पसीने से लथपथ हुआ,
भागते-भागते जब कभी।

पहुँच जाता था मैं, अपने घर के उस,
अनजाने बंद कमरे में!!
घर के बरामदे में,
सबसे पीछे बने उस कमरे में।
वो कमरा,
जो ज़्यादा बड़ा नहीं था,
छोटा ही था, और अक्सर,
बंद रहा करता था।

घर में कोई न था,
उसे पूछनेवाला,
जो करता देखभाल उसकी।

सारे घर में पसरा कोलाहल भी जैसे,
ख़त्म-सा हो जाता था,
इसकी चौखट तक आकर।

और ये,
बेजान-बेज़ुबान बना,
यूँही खड़ा रहता था,
अपने बोझ को उठाए।

सम्भवतः, पिछली दीवाली से,
कोई आया भी नहीं था यहाँ।
और इसलिए पड़ चुकी थी धूल,
उन यादों पर,
जो रह रहीं थीं इस कमरे में,
अकेले, जाने कब से???

यादें जो वक़्त के साथ बदलते,
हालातों की कहानी थीं।
ज़िंदा जज़्बातों की बयानी थीं।

रखे थे वहाँ कुछ पुराने रौशनदान,
टूटी लकड़ी की कुर्सियाँ,
और हाल में बदली गई एक चारपाई।

कुछ गुज़रे हुए चेहरे भी,
दीवारों पर टँगे थे...तस्वीरों में क़ैद।
शायद इसलिए,
कि अब ड्रॉइंग रूम की शोख़ दीवार पर,
वे अच्छे नहीं लगते।
या इसलिए, कि वे नहीं कर पाए बराबरी,
वक़्त की रफ़्तार से....!!

अब जो पीढ़ी यहाँ रहती है,
वो उन्हें जानती तक नहीं है।
न वे लोग अब पाए जाते हैं,
कहानियों में ही...!!
वे लोग छूट गए हैं बहुत पीछे...
ज़िन्दगी, आगे निकल आई है।

सुना है!! यही घर का वो पहले कमरा था,
जिसकी ईंटों की जुड़ाई में,
चूने के साथ मिला था, बाबा का पसीना भी।

इसकी ये ऊँची छत, टिकी थी उन्हीं के,
ज़िम्मेदार कांधों पर।

सुना है!! इसे बड़े शौक से रँगवाया गया था,
सारी गली में दावत हुई थी उस रोज़!!

और अब,
बाकी पूरा घर पक्का कंक्रीट का बन गया है,
....शायद इसमें रहने वाले भी...
पैर रखने के लिए भी अब,
शफ्फ़ाक संगमर्मर बिछा है हर ओर!!

पर शायद इस कमरे की ऊबड़खाबड़,
फ़र्श और सीलन भरी दीवारों से,
आज भी मिलती है,
एक अजीब-सी, ठंडक।
ऐसी ठंडक जो अक्सर पाई जाती है,
किसी उम्रदराज़ बरगद की छाँह में,
मित्र की बाँह में,
माँ के आँचल में, या बुज़ुर्गों के साए में।

मैं, इसीलिए मौका मिलते ही,
मॉडर्न कंस्ट्रक्शन की ज़द से निकलकर,
आ बैठता हूँ!!

घर के बरामदे में सबसे पीछे बने,
इस टूटे-फूटे फ़र्श वाले,
पुराने कमरे में,
कुछ देर ही सही, मगर

इस झुलसाती और सुलगाती,
दुनिया से निजात पाने।

- अंशुल तिवारी
09.09.18

Tuesday, 4 September 2018

श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 01

ईश वंदना-
हे विघ्ननाशन! गणपति, तुमको नमन प्रारम्भ में,
पश्चात इसके कर रहा, निज कार्य को आरम्भ मैं।
हे शारदे! सादर नमन मेरा तुम्हें स्वीकार हो,
माँ, ज्ञान, बुद्धि, तेज की तुम ही यहाँ आधार हो।

करुणानिधान सुजान, हे श्रीराम! जय-जय आपकी,
मुझको चरण में दो शरण, कर भस्म जड़ संताप की।
हे विश्वमोहन! शेषशायी, जगत के पालक हरि,
मुझ दीन हेतु नेह की, कीजै प्रवाहित सुरसरि।

भूमिका-
भारत अलौकिक भूमि है, अनुपम है इसकी हर कथा,
जो ज्ञान, गुण, विज्ञान से, भरपूर रहती सर्वथा।
जीवन प्रबंधन के लिए, जो भी ज़रूरी तत्व है,
सब इन कथाओं में निहित है, सार-संग्रह, सत्व है।

हम आज ऐसी ही कथा का, कर रहे उल्लेख हैं,
जिसके सभी संदर्भ चर्चा में, विशिष्ट, विशेष हैं।
है कथा बीते काल की, पर नित नई नूतन लगे,
इसमें वचन श्रीकृष्ण के, हैं ज्ञान, मुक्ति में पगे।

ये भाग है उस ग्रंथ का, जिसको रचा मुनि व्यास ने,
पर जन्म इसको है दिया, कुन्तीतनय की प्यास ने।
हाँ बात हम करते हैं, भारत के महाभारत की ही,
जिसमें जड़ी है, दमकती, अति दिव्य 'गीता'-सी मणि।

श्री व्यास ने इसमें लिखी है मनुज की संभावना,
और साथ ही 'गीता' में लिख दी, मुक्ति की प्रस्तावना।
मानव समाज हुआ कृतार्थ, महर्षि के इस कृत्य से,
सब आवरण हर कर, मिलाया जिसने सबको सत्य से।

मुख्य लेख-
है विदित जन को, जब सुयोधन का अहम सर पर चढ़ा,
निज बंधु का अधिकार करने को हनन आगे बढ़ा।
तब कृष्ण ने चेतावनी दे, यह सुनिश्चित कर दिया,
पांडव न होंगे नत, लड़ेंगे धर्म रचने को नया।

इस के अनंतर युद्ध भीषण, दो दलों में ठन गया,
करने विशिख वृष्टि प्रबल, धनु बाँकुरों का तन गया।
लो आ खड़े हो गए सन्मुख, युद्धथल में स्नेहीजन,
हाँ देखकर जिसको धरा क्या, हिल गया किञ्चित गगन।

दोनों ही ओर समर्थ वीरों का लगा भंडार था,
सेना समूह प्रबल, विशिष्ट, समग्र पारावार था।
पलकें बिछाए था खड़ा विध्वंस कुरु के क्षेत्र में,
जैसे महापावक भरा हो, रुद्र के त्रिनेत्र में।

(धृतराष्ट्र-संजय संवाद)
इस परिस्थिति के जनक, भी बैठे थे अपने कक्ष में,
ले साथ संजय सारथी, रण देखने प्रत्यक्ष में।
धृतराष्ट्र तब बोले वचन निज सूत से विस्मय भरे,
मुझको बताओ युद्ध में,कुरु-पाण्डु सुत क्या कर रहे?

संजय ने मुनिवर व्यास से, ये पा रखा वरदान था,
वह महारण को देखने में, हो गया सज्ञान था।
निज नाथ के सुनकर वचन संजय लगा कहने तभी,
हे भरत कुलभूषण! खड़े हैं सज्ज सब योद्धा अभी।

युवराज गुरुवर द्रोण से आ कर वचन हैं कह रहे,
आचार्य किञ्चित पाण्डुपुत्रों की चमू को देखिए।
है द्रुपदसुत सेनापति, संग विकट योद्धा अन्य हैं,
सात्यकि, कुन्तिभोज, भीम, अर्जुन सभी मूर्धन्य हैं।

मैं देखता हूँ कुछ नए तारे उदित हैं हो गए,
सौभद्र के संग द्रौपदीसुत भी रणोन्मुख हो गए।
हे विप्रवर! ये देखिए इस ओर भी क्या ताप है!
हैं भीष्म सेना के पति, धनु संग तत्पर आप हैं।

आचार्य कृप विजयी, विकर्ण, के संग है तव सुत बली,
भूरिश्रवा हैं, साथ है मम मित्र कर्ण महाबली।
हैं वीर अन्या-अन्य जो मेरे लिए जीवन तजें,
हैं रणकुशल ये सब, उचित है शत्रु ईश्वर को भजें।

जिस सैन्य की रक्षा स्वयं गंगातनय हों कर रहे,
है मनुज की तो बात क्या? ख़ुद देव भी उससे डरें।
अतएव, आप विशिष्ट वीरों का समूह बनाईये,
और शीघ्र कुरुसेनापति सेवार्थ ही पहुंचाइए।

तब वीरवर श्री भीष्म ने, कर सिंह की सी गर्जना,
कर शंखध्वनि अति घोर, दे दी शत्रुदल को वर्जना।
पश्चात इसके अनगिनत रण वाद्य मिलकर बज गए,
सुन घोर स्वर उत्पन्न पाण्डव भी तुरत ही सज गए।

सबसे प्रथम श्वेताशव रथ पर, यदुपति ने यह किया,
वातावरण निज शंख के अति घोर स्वर सेे भर दिया।
पा प्रेरणा इसके अनंतर भीम, अर्जुन उठ गए,
धर्माधिपति संग अनुज सब, रणघोषणा में जुट गए।

जब एक संग ही देवदत्तोपौंड्र का स्वर छा गया,
(देवदत्त-अर्जुन का शंख, पौण्ड्र- भीम का शंख)
ऐसा लगा जैसे निमंत्रण काल था तब पा गया।
हर एक योद्धा शंख लेकर घोर ध्वनि था कर रहा,
ज्यों मृत्यु को ललकार, हुँकार ही था भर रहा।

(श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद)
तब अचानक कुंतीतनय यह कृष्ण से कहने लगा,
हे देव! रणथल मध्य में स्यंदन तनिक कीजै खड़ा।

दुर्बुद्ध दुर्योधन के हित चिंतक यहाँ जो आए हैं,
संग्रामस्थल पर श्याम घन की भाँति ये जो छाए हैं।
में देखना हूँ चाहता आए यहाँ पर कौन हैं,
देकर अधम का साथ भी जो ,शस्त्रसज्जित मौन हैं।

श्री कृष्ण भी क्षण एक में, रथ वेग से लेकर चले,
थे जहाँ सज्जितशस्त्र लेकर भीष्म और गुरुवर खड़े।
बोले वचन तब पार्थ से, लो देख लो जो चाहिए,
तेरे हृदय में अब कोई संशय न रहना चाहिए।

अर्जुन ने जब कर लक्ष्य देखा ,कौरवों की सैन्य को,
अत्यंय मर्माहत हुआ, उपलब्ध होकर दैन्य को।
तब ग्रसित होकर शोक से, वह रुदन था करने लगा,
संकल्प जर्जर हो गया, अर्जुन ठगा-सा रह गया।

साहस समेटा पार्थ ने, और वचन भगवन से कहे,
(विधि का कुरूप विधान कोई भी, भला कब तक सहे)।

है नरोत्तम! ये दृश्य कितना है विकट, विकराल है,
निज बंधुओं के शीष ओर फण खोल बैठा काल है।
हर क्षण इन्हें यों देखकर, मन शोक से है जल रहा,
पल-पल कठिन संताप ये, मेरे हृदय में पल रहा।

हर अंग मेरा शिथिल होकर, शक्ति अपनी खो रहा,
अपने सगे-संबंधियों को देख है मन रो रहा।
हे सखा! देखो वो पितामह भीष्म, कुरुकल ज्येष्ठ हैं,
जो प्रेम के सागर हैं और अति वीर योद्धा श्रेष्ठ हैं।

मैं गोद में जिनकी उछल कर बैठ जाता था कभी,
कैसे है सम्भव युद्ध उनसे कर सकूँगा मैं अभी।
जिस वृक्ष की छाया में पलकर सुख अलौकिक था मिला,
हा!! काटने उसको ही विधि ने, कर दिया मुझको खड़ा।

ये भाग्य ने मुझको दिया, कैसा अनोखा दंड है,
ये अत्यधिक दुष्कर है, कितना क्रूर कर्म प्रचंड है।
ये वीरवर, तेजस्वियों में अग्रणी हैं जो खड़े,
क्या-क्या कहूँ उपकार मुझपर, कर चुके कितने बड़े।

हे कृष्ण! सच कहता हूँ, मेरे पास जो भी ज्ञान है,
सब इन्हीं की निश्छल कृपा का ही हुआ परिणाम है।
मैं तो बड़ा निर्बोध था, मुझको न कोई ज्ञान था,
न बोध था निज शक्ति का, न योग्यता का भान था।

मैं तो पड़ा था कोयले-सा, धूल में लिपटा हुआ,
मैं था शिला का खंड बस, अनगढ़, धरा पर था पड़ा।
जिस पल मुझे गुरुदेव ने निज अंक में धारण किया,
जब प्रेम का पावन अमिय, बिन स्वार्थ, बिन कारण दिया।

मैं देखते ही देखते पत्थर से हीरा हो गया,
अज्ञान का तम मेरे जीवन से सदा को खो गया।
अपने परिश्रम से मुझे पाषाण से प्रतिमा किया,
निज पुत्र सा ही जान कर, जाने कहाँ पहुँचा दिया।

मुझको प्रशिक्षण दे, बनाया धनुर्धर सर्वाग्रणी,
मैं रहूँगा पर्यंत जीवन, इस कृपा के हित ऋणी।
संसार ये जिस रूप में पहचानता है अब मुझे,
वह है मेरे गुरुदेव की ही तो दया का फल सखे!

जिसने पकड़कर हाथ, शर संधान सिखलाया मुझे,
सद्धर्म का, सत्कर्म का, सन्मार्ग दिखलाया मुझे।
जिनकी चरण रज को सदा ही शीष पर मैंने रखा,
कैसे कटेगा शीष उनका हाथ से मेरे भला??

जिस कण्ठ ने मुझको सदा, जय का दिया आशीष था,
किस भाँति उसको बाण से, मैं बींध दूँगा अब भला??
गुरुद्रोह का ही पाप भीषण है, मुझे यह ज्ञात है,
गुरुवध मुझे करना पड़े ,ये तो सघन संताप है।

इससे कहीँ भी हो सकेगा त्राण तो मेरा नहीं,
इस दुःख न मुक्त होगा प्राण ये मेरा कहीँ।

हे कृष्ण! यह सब देख के, है धनुष कर से छूटता,
ये युद्ध का संकल्प होकर क्षीण, अब है टूटता।
मुझको न तो जय चाहिए, न राज्य का ही सुख अहो!
क्या लाभ है? निज बंधुओं को मारने में फिर कहो??

ये हाय! हैं परिवार जन, निज तातसुत, मातुल, सुजन,
हैं भाई, भ्रातृज, श्वसुर हैं, गुरु हैं, पितामह, श्रेष्ठजन।
त्रैलोक्य के भी राज्य हित, इनको नहीं मारूँगा मैं,
कर पुण्य अपना क्षय, कुपथ पर पग नहीं धारूँगा मैं।

ये लोभ ज्वर से ग्रसित हैं, इनको नहीं कुछ भान है,
क्या कर रहे, क्या कर चुके, इनको न इसका ज्ञान है।
लेकिन कृपा से आपकी हम हो गए सज्ञान हैं,
संग्राम हितकारी नहीं होता, हमें यह ध्यान है।

फिर आप क्यों इस पाप में हमको फँसाते हैं प्रभो??
इस घोर दूषित कर्म में, हमको लगाते हैं प्रभो!!

संजय उवाच-
हे नृप! ये कहकर पार्थ ने है, रख दिया अपना धनुष,
रथ पृष्ठ में वह हैं गए, होकर दुखी, रण से विमुख।

।।प्रथमोध्याय समाप्त।।

Wednesday, 22 August 2018

श्री अटल जी का स्मरण

तुम विदा हुए हो सृष्टि चक्र से,
मन से कैसे जाओगे??
इस भारत भू से विलग हुए,
जन-गण से कैसे जाओगे??

तुमने तो पाई अटल स्तिथि,
गति पाई जो पाए योगी।
लेकिन सोचो ये बिना तुम्हारे,
यहाँ परिस्तिथि क्या होगी??
इन आकुल-व्याकुल नैनों को,
अब त्राण कौन दे पाएगा?
तुम जैसा धरतीसुत धरती,
पर अब शायद ही आएगा??

तुम मुक्त हुए, तुम दूर हुए,
जन-मन से कैसे जाओगे??

तुम थे, तो थी ये आस अटल,
तुम से जय का विश्वास अटल!
तुम नीति नियम के साधक थे,
जन के हित के आराधक थे!
तुम शक्ति-शांति के अनुगामी,
मैत्री सन्देश के वाहक थे।
हे! भीष्म प्रतिज्ञा के पालक,
जन सुख सरिता के संचालक!!

तुम स्थूल रूप में विलग हुए,
चेतन से कैसे जाओगे?? (चेतन मन के संदर्भ में)

हे त्याग! तपस के मूर्त रूप,
हे लोकमान्य! हे पितृरूप!!
हे विद्या, विनय, विवेकवान!
हे! अटल, अडिग, मानव महान!!
हे स्वाभिमान के अनुयायी,
दे रिपु को भी जो अभयदान!
करुणावादी, आदर्शवान,
भारत भू की तुम आन ,बान!

अपने आराध्य राष्ट्र भारत के,
प्रण से कैसे जाओगे??

कविताई के अप्रतिम शिखर,
हे ज्ञानवान! विद्वान प्रखर।।
जन-जन के तुम नेता निश्छल,
निष्ठावादी, तुम अटल, सबल।
वसुधा को ही परिवार मान,
निज सुख को था कर दिया दान।
हे शिवि, दधीचि के अनुगामी,
हे विद्यानिधि! उद्भट ज्ञानी!

ये धरती तुम्हें बुलाती है,
तव सुमिरन में अकुलाती है।
जो भी विधिना का हो विधान,
हमको बस है इतना ही ज्ञान।
तुम सदा रहोगे हर मन में,
भारत माता के कण-कण में।
निष्ठा सेवा के हर प्रण में,
कविता की प्रेरक गुंजन में।

हे कवि! बोलो तुम श्रोता के,
वंदन से कैसे जाओगे??

तुम मुक्त हुए, तुम दूर हुए,
जन-मन से कैसे जाओगे??

-अंशुल तिवारी।

Sunday, 19 August 2018

श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भावांजलि

कौन है जिसके लिए,
आकाश है काँधा झुकाए।
कौन है जिसके लिए,
सहमी खड़ी हैं दिग-दिशाएँ।
कौन है जिसके लिए,
धरती थमी सी लग रही है।
कौन है जिसके लिए,
मन में कमी सी लग रही है।
कौन है जिसके लिए,
प्रत्येक जन है धीर खोता,
कौन है जिसके लिए,
व्याकुल नयन हैं, मन है रोता।

कौन है जिसके लिए,
पहिया समय का रुक गया है।
कौन है जिसके लिए,
हर एक मस्तक झुक गया है।
कौन है जिसके लिए,
श्रद्धाविनत संसार है ये।
कौन है जिसके लिए,
सम्मान के उपहार हैं ये।
कौन है जिसके लिए,
दिल में जगह सबके बनी है।
कौन है जिसके लिए,
सबकी विधाता से ठनी है।

कौन है जिसके लिए,
उपमाएँ भी लज्जित खड़ी हैं।
कौन है जिसके लिए,
संज्ञाएँ सब छोटी पड़ी हैं।
कौन है जिसके लिए,
है स्वर्ग भी पलकें बिछाए।
कौन है जिसके लिए,
बाँधे स्वयं को है हवाएँ।
कौन है जिसके लिए,
है शत्रुओं की आँख भी नम।
कौन है जिसके लिए,
जन त्याग निजता हो गए हम।

कौन है जिसके लिए,
सुरलोक में उत्साह अविरल।
कौन है जिसके लिए,
सीधी वहाँ की राह निर्मल।
ये नहीं है और कोई,
भारती का सुत अलौकिक।
जो जिया शालीनता से,
धर्म के पथ पर चतुर्दिक।
था सदा जिसके कथन पर,
सिर सभी ने ही झुकाया।
जिसने अपने नेह से,
जन-जन को था अपना बनाया।

जिसने दृढ़ संकल्प कर यूँ,
पाठ दृढ़ता का पढ़ाया।
विश्व में माँ भारती का,
मान, गौरव था बढ़ाया।
जिसने हरदम मित्रता का,
राग अरिसम्मुख था गाया।
और जग में भारती की,
शक्ति का परचम उठाया।

जिसने संघर्षों के पथ से,
जी कभी था न चुराया।
बढ़ सघन अंधियार में भी,
शांति का दीपक जलाया।
जिसने उत्तम नीति का नव,
पंथ दुनिया को दिखाया।
शत्रुता को जीतने के,
हेतु पहला पग उठाया।

हाय! कैसा दिन?? के लो,
वो जा रहा है, जा रहा है!!
स्वर्ग के देवों सुनो वो!
आ रहा है, आ रहा है!!
हे विधाता! क्या तुझे भी,
आज है उसकी ज़रूरत।
शांति और शक्ति की मिश्रित,
जो अलौकिक दिव्य मूरत।

आज माता भारती की,
आँख भी नम हो गई है।
गिनती उसके वीर पुत्रों,
की पुनः कम हो गई है।
क्या करें हम, कुछ न सूझे,
कुछ नहीं आता समझ है।
पर विधि की कल्पना पर,
चल सका किसका ही वश है।

हो नमन स्वीकार तुमको,
ओ यशस्वी! ओ चिरन्तन!
हम सभी करबद्ध होकर,
कर रहे मनपूर्ण वंदन।
तुम पुनः आओ, के भारत,
को तुम्हारी है ज़रूरत।
तुम से ही उज्ज्वल, धवल है,
भारती की दिव्य मूरत।

है यकीं हमको न तुम ये,
भूमि तज कर जा सकोगे।
भारती के स्नेह को तज,
कर नहीं तुम जा सकोगे।

- अंशल तिवारी।

Tuesday, 24 July 2018

ग़ज़ल कहना नहीं आसान

ग़ज़ल कहना नहीं आसान प्यारे,
बड़ा मुश्किल है इम्तेहान प्यारे।

लगाओ दम, अगर है दम तो देखो,
निकल आएगी इसमें जान प्यारे।

भला यूँ दिल्लगी में इस तरह मत,
यहाँ ख़ुद को करो क़ुर्बान प्यारे।

ये है दरिया के जिसमें आग ही है,
ये खेल इतना नहीं आसान प्यारे।

यहाँ दुश्वारियाँ हैं हर कदम पर,
तुम्हें जिनकी नहीं पहचान प्यारे।

बस अपना हौसला हिम्मत न हारो,
यही हैं जीत के इमक़ा प्यारे।

ज़हन मासूमियत लबरेज़ रक्खो,
बुलंदी पर रखो ईमान प्यारे।

ग़ज़ल में जल्दबाज़ी ही मना है,
ज़रा सा रखो इत्मीनान प्यारे।

- अंशुल तिवारी।