hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Saturday, 26 November 2016

भाषण...

भाषण, वक्तव्य विधा का सबसे सरल प्रकार है (व्यंगात्मक रूप से)।
अक्सर लोग इसे बड़ी सहजता से दे भी देते हैं।
शायद देने में यही वो पहली वस्तु होगी लोग जिसे किसी दूसरे को देने को हमेशा, एक पैर पर तैयार रहते हैं।
एक ख़याल इस बात पर,
----------------------------------
सुना हमने जो भाषण, कहा उनसे ठहर जाओ।
के जो समझा रहे हो तुम, वो ख़ुद करके दिखाओ।

जो है अंगार पे चलना, कदम पहले बढ़ाओ।
लटकना है जो सूली पर, तो हाथ अपना उठाओ।

ज़हर का घूँट पीना है, तो तुम प्याला उठाओ।

मियाँ हँसकर ज़रा बोले, न यूँ हमको फ़ँसाओ।
इन्हें बातें ही रहने दो, हकीकत न बनाओ।

अगर कुछ फ़ायदा चाहो, हमारे साथ आओ।
चढ़ो मंचों पे हाँको, ख़याल के घोड़े दौड़ाओ।

जो श्रोता हैं उन्हें वादों का घिस, चन्दन लगाओ।
ज़माना है सुनो मत, सुनाकर life बनाओ।

- अंशुल।

Tuesday, 22 November 2016

उलझन...

सुनता आया हूँ
हमेशा कि, काफ़ी है
समझदार को इशारा ही।
मगर मैं सोचता हूँ,
वो जो समझदार है,
उसे क्यूँ चाहिए इशारा??
क्यूँ नहीं वो समझ सकता,
हालत को देखकर,
या महसूसकर??
और यदि फिर भी चाहिए,
इशारे का सहारा,

तो नासमझ करे क्या बेचारा??

-अंशुल।

Wednesday, 9 November 2016

काश...

काश, 
बस कुछ देर और
जो नींद नहीं टूटती।
तो,
तैरता मैं सपनों की झील में,
उड़ता ख़्याल के बादल पर,
टहलता ख़्वाबों के समंदर किनारे,
कुछ देर और भीग लेता,
ख्वाहिशों की बारिश में।
मगर करूँ क्या??

रात जब भी हसरतें थपकियाँ देकर सुलाती हैं, 
ज़रूरतें झंझोड़कर जगाने चली आती हैं।


- अंशुल।

Saturday, 5 November 2016

वो...

बातें होती ही रहती हैं, होती भी रहेंगी...
बातों का क्या है,
पर ये ख़्याल समर्पित है उन्हें जो बात को समझे तो नहीं हैं पर समझाते खूब हैं।
------------///----------

वो कहते रहे,
मैं सुनता रहा,
सिलसिला चलता रहा।

सुनते-सुनते फिर शाम ढली,
जब शाम ढली तो पता चला।

जो बात वो मुझसे कहते हैं,
वे ख़ुद भी नहीं समझते हैं।

फिर क्यों वे कहते रहते हैं,
न उन्हें पता, न मुझे पता।

मैं उठा,
उठे वो साथ मेरे, मैं इधर गया,
वो किधर गए?

कुछ नहीं पता, कुछ नहीं पता।

-अंशुल।

Friday, 4 November 2016

वेदना...

वेदना कहती है मुझको,
आज तो अभिव्यक्त कर दो।
शब्द का देकर सहारा,
आज मुझको मुक्त कर दो।

कह भी दो अब वह कथा,
कब जन्म था मैंने धरा।
क्यूँ मुझे धारण किए हो,
आज कह भी दो ज़रा।

क्यूँ किए मन को व्यथित,
चलते हो शूलों की डगर।
पाओगे परित्राण राही,
मुझको मन से त्याग कर।

पर मैं कहता वेदना से,
त्यागकर तुझको भला।
चैन से क्या रह सकूँगा??
त्राण क्या पाऊँ भला??

साथ तेरा लिए मैं चलता रहा, लिखता रहा,
भावनाएँ व्यक्त कर नव गीत मैं रचता रहा।
तू बनी साथी मैं जब भी दुःख से आतप्त था,
छोड़कर तुझको बता कैसे रहूँगा मैं भला??

सच है तपकर वेदना से जन्म पाता गीत है,
वेदना मन की सखी है, और ये ही मीत है।
वेदना अनिवार्य है, जीवन गति का मूल है,
वेदना का ताप सहना मनुज के अनुकूल है।

- अंशुल तिवारी

Wednesday, 2 November 2016

इंतज़ार...

मेरे सवाल कब से इंतज़ार कर रहे हैं,
तुम्हारे जवाब का।
कब टूटेगी तुम्हारी चुप्पी??
ख़ामोशी की घनी मेघावली से,
कब छिटकेगी तुम्हारी मुस्कान?
ख़ैर,
सवाल कितने भी क्यों न हों,
मैं प्रतिबद्ध, प्रतीक्षारत खड़ा हूँ।
इस उम्मीद में कि,
लहरें तोड़ मर्यादाओं की बेड़ियाँ,
कभी तो आ मिलेंगी साहिल से।

-अंशुल।