वेदना कहती है मुझको,
आज तो अभिव्यक्त कर दो।
शब्द का देकर सहारा,
आज मुझको मुक्त कर दो।
कह भी दो अब वह कथा,
कब जन्म था मैंने धरा।
क्यूँ मुझे धारण किए हो,
आज कह भी दो ज़रा।
क्यूँ किए मन को व्यथित,
चलते हो शूलों की डगर।
पाओगे परित्राण राही,
मुझको मन से त्याग कर।
पर मैं कहता वेदना से,
त्यागकर तुझको भला।
चैन से क्या रह सकूँगा??
त्राण क्या पाऊँ भला??
साथ तेरा लिए मैं चलता रहा, लिखता रहा,
भावनाएँ व्यक्त कर नव गीत मैं रचता रहा।
तू बनी साथी मैं जब भी दुःख से आतप्त था,
छोड़कर तुझको बता कैसे रहूँगा मैं भला??
सच है तपकर वेदना से जन्म पाता गीत है,
वेदना मन की सखी है, और ये ही मीत है।
वेदना अनिवार्य है, जीवन गति का मूल है,
वेदना का ताप सहना मनुज के अनुकूल है।
- अंशुल तिवारी
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