मेरे सवाल कब से इंतज़ार कर रहे हैं,
तुम्हारे जवाब का।
कब टूटेगी तुम्हारी चुप्पी??
ख़ामोशी की घनी मेघावली से,
कब छिटकेगी तुम्हारी मुस्कान?
ख़ैर,
सवाल कितने भी क्यों न हों,
मैं प्रतिबद्ध, प्रतीक्षारत खड़ा हूँ।
इस उम्मीद में कि,
लहरें तोड़ मर्यादाओं की बेड़ियाँ,
कभी तो आ मिलेंगी साहिल से।
-अंशुल।
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